इंदौर। पार्षद की जिम्मेदारी केवल अपने समर्थकों या किसी एक वर्ग की आवाज उठाना नहीं, बल्कि पूरे वार्ड की समस्याओं का समाधान कराना भी है। सड़क पर अतिक्रमण, यातायात जाम और आम लोगों की रोजमर्रा की परेशानियों के बीच जनता अपने जनप्रतिनिधि से स्थायी समाधान की उम्मीद करती है। ऐसे में इंदौर में पार्षद कुणाल सोलंकी का हॉकर्स जोन और ठेले वालों के समर्थन में हालिया धरना कई सवाल खड़े कर रहा है।

नगर निगम की ओर से त्योहारों के दौरान ठेले हटाने और कार्रवाई किए जाने के विरोध में पार्षद सड़क पर बैठ गए। ठेले वालों के पक्ष में आवाज उठाना जनप्रतिनिधि के अधिकार क्षेत्र में है, लेकिन सवाल यह है कि यदि हॉकर्स जोन की जरूरत लंबे समय से महसूस की जा रही थी, तो वर्ष 2022 से अब तक इसे बनवाने के लिए कितनी ठोस पहल हुई? क्या निगम स्तर पर लगातार दबाव बनाया गया या कार्यकाल के आखिरी छह महीनों में यह मुद्दा अचानक प्राथमिकता बन गया?
चार साल में हॉकर्स जोन के लिए क्या प्रयास हुए?
पार्षद कुणाल सोलंकी वर्ष 2022 से अपने क्षेत्र का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं। उनके हालिया धरने के बाद यह सवाल उठ रहा है कि हॉकर्स जोन की मांग को जमीन पर उतारने के लिए अब तक कौन से ठोस कदम उठाए गए।
पार्षद का कहना है कि वह लगातार इस मांग को उठा रहे हैं और करीब छह महीने पहले भी इस संबंध में पत्र लिखा था। उनके मुताबिक, उन्हें आश्वासन भी मिला था। लेकिन आश्वासन के बाद भी हॉकर्स जोन नहीं बन पाया, तो यह जानना जरूरी है कि इसके बाद नगर निगम में कितनी बार औपचारिक रूप से मुद्दा उठाया गया।
क्या प्रस्ताव तैयार हुआ, जमीन चिह्नित की गई या संबंधित अधिकारियों के साथ कोई समय सीमा तय हुई? इन सवालों का जवाब सामने आना चाहिए। हॉकर्स जोन केवल ठेले वालों के रोजगार का मामला नहीं है, बल्कि सड़क पर यातायात और आम नागरिकों की सुविधा से भी जुड़ा है।
त्योहार के दौरान कार्रवाई के विरोध में सड़क पर उतरे पार्षद
त्योहारों के दौरान बाजारों में ग्राहकों की आवाजाही बढ़ जाती है। ऐसे समय में ठेले वालों की आजीविका और सड़क पर यातायात बनाए रखने के बीच संतुलन बनाना नगर निगम के लिए चुनौती होता है।
इसी दौरान ठेले हटाने की कार्रवाई का विरोध करते हुए पार्षद कुणाल सोलंकी ने धरना दिया। आरोप है कि इस दौरान निगम कर्मचारियों के साथ उनकी बहस और बदसलूकी भी हुई। हालांकि, इस घटनाक्रम पर संबंधित पक्षों का विस्तृत आधिकारिक पक्ष सामने आना बाकी है।
ठेले वालों के समर्थन में खड़ा होना एक बात है, लेकिन क्या इसका समाधान मुख्य सड़क पर धरना देकर निकाला जाना चाहिए? यदि कार्रवाई गलत थी, तो लिखित आपत्ति, अधिकारियों से बातचीत और हॉकर्स जोन की ठोस योजना जैसे विकल्प भी मौजूद थे।
जनता की परेशानी कौन देखेगा? जाम और एंबुलेंस की आवाजाही का सवाल
इंदौर जैसे शहर में सड़कें केवल बाजार और कारोबार के लिए नहीं, बल्कि आपातकालीन सेवाओं के लिए भी महत्वपूर्ण हैं। मुख्य मार्गों पर जाम लगने से एंबुलेंस और अन्य जरूरी सेवाओं की आवाजाही प्रभावित होने का खतरा रहता है।
ऐसे में सड़क पर धरने से यदि यातायात बाधित होता है, तो इसका असर आम नागरिकों पर पड़ सकता है। मरीजों को अस्पताल पहुंचने में देरी जैसी आशंकाओं को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
मुद्दा किसी एक पक्ष के समर्थन या विरोध का नहीं, बल्कि व्यवस्था बनाने का है। ठेले वालों को रोजगार के लिए उचित जगह मिले और नागरिकों को जाम से राहत भी। सवाल है कि क्या पार्षद ने इन दोनों जरूरतों को ध्यान में रखकर कोई ठोस वैकल्पिक व्यवस्था सुझाई है?
निगम कमिश्नर और महापौर के स्तर पर कितनी बार उठाया मुद्दा?
राजनीतिक और प्रशासनिक स्तर पर यह सवाल भी उठ रहा है कि यदि हॉकर्स जोन की मांग लंबे समय से लंबित थी, तो क्या पार्षद ने पहले नगर निगम कमिश्नर या महापौर पुष्यमित्र भार्गव के सामने इस मुद्दे पर प्रभावी तरीके से बात रखी थी? क्या अधिकारियों से समयबद्ध समाधान की मांग की गई थी?
इन सवालों के जवाब के बिना यह निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा कि धरना केवल राजनीतिक लाभ के लिए दिया गया। हालांकि, कार्यकाल के आखिरी छह महीनों में इस मुद्दे पर सड़क पर उतरने से राजनीतिक समय और मंशा को लेकर सवाल जरूर उठ रहे हैं।
पार्षद के लिए अब चुनौती है कि वे अपने दावे के समर्थन में अब तक किए गए पत्राचार, बैठकों और प्रस्तावों का ब्यौरा सार्वजनिक करें। इससे स्पष्ट हो सकेगा कि हॉकर्स जोन की मांग लगातार उठाई जा रही थी या इस दिशा में प्रभावी कार्रवाई अब शुरू हुई है।
ठेले वालों को राहत या राजनीतिक जमीन मजबूत करने की कोशिश?
धरने से ठेले वालों के एक वर्ग को समर्थन का एहसास हुआ होगा, लेकिन वार्ड के वे नागरिक भी हैं जो रोजाना सड़क पर जाम और अव्यवस्था से परेशान होते हैं। उनकी समस्याओं का समाधान भी उतना ही जरूरी है।
जनप्रतिनिधि की जिम्मेदारी किसी एक वर्ग के पक्ष में खड़े होने तक सीमित नहीं होती। उसे ठेले वालों के रोजगार, पैदल चलने वालों की सुविधा, दुकानदारों के हित और सड़क पर यातायात के बीच संतुलन बनाना होता है।
यदि हॉकर्स जोन की मांग वर्षों से लंबित है, तो अब पार्षद और नगर निगम को मिलकर उसकी जगह, क्षमता, नियम और समय सीमा तय करनी चाहिए। केवल धरने से समस्या का स्थायी समाधान नहीं निकलेगा।
कार्यकाल के आखिरी छह महीनों में इन सवालों का जवाब राजनीतिक बयानबाजी से नहीं, बल्कि जमीन पर होने वाले काम से मिलेगा। ठेले वालों को रोजगार, आम लोगों को सुगम यातायात और शहर को व्यवस्थित बाजार उपलब्ध कराना ही किसी जनप्रतिनिधि की असली परीक्षा है।