September 14, 2026

भोपाल। राजधानी भोपाल में रहवासी क्षेत्रों में संचालित व्यावसायिक गतिविधियों को लेकर मचा विवाद अब मास्टर प्लान पर आकर टिक गया है। एक तरफ व्यापारी, आम लोग और जिम्मेदारों की ओर से यह तर्क सामने आ रहा है कि नया मास्टर प्लान नहीं आने के कारण शहर में संकट खड़ा हुआ है और मिक्स लैंड यूज का स्पष्ट प्रावधान नहीं है। दूसरी ओर, उपलब्ध दस्तावेजी जानकारी के आधार पर सामने आया है कि भोपाल के वर्तमान मास्टर प्लान-2005 में ही सीमित रूप से मिक्स लैंड यूज का प्रावधान मौजूद है।

ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यह खड़ा हो रहा है कि अगर मौजूदा मास्टर प्लान में ही आवासीय क्षेत्रों में निर्धारित सीमा के भीतर व्यावसायिक गतिविधियों की अनुमति का प्रावधान था, तो अब तक उसका प्रभावी क्रियान्वयन क्यों नहीं हुआ?

मास्टर प्लान-2005 में आवासीय क्षेत्र में कारोबार का प्रावधान

भोपाल में वर्तमान में लागू मास्टर प्लान-2005 के प्रावधानों के मुताबिक आवासीय क्षेत्रों में कुछ शर्तों और निर्धारित सीमा के भीतर व्यावसायिक गतिविधियों की अनुमति का प्रावधान है।

इसके तहत ग्राउंड फ्लोर पर प्लॉट के 25 प्रतिशत हिस्से या 50 वर्गमीटर, जो भी कम/लागू सीमा के अनुसार हो, का उपयोग व्यावसायिक गतिविधि के लिए किया जा सकता है। इसके अलावा भी अलग-अलग गतिविधियों और क्षेत्रों के लिए नियम एवं शर्तें निर्धारित हैं।

यानी यह कहना कि मौजूदा मास्टर प्लान में आवासीय क्षेत्र में व्यावसायिक गतिविधियों के लिए कोई प्रावधान ही नहीं है, सवालों के घेरे में आता है।

फिर क्यों नहीं हुआ प्रावधानों का पालन?

यही वह बिंदु है, जहां भोपाल के मौजूदा विवाद का सबसे बड़ा सवाल सामने आता है। यदि मास्टर प्लान-2005 में निर्धारित सीमा के भीतर मिक्स लैंड यूज अथवा व्यावसायिक उपयोग का प्रावधान था, तो संबंधित विभागों ने इसे लागू करने और व्यवस्थित तरीके से व्यावसायिक गतिविधियों को नियमित करने की दिशा में क्या कदम उठाए?

वर्तमान स्थिति यह है कि कई रहवासी क्षेत्रों में लंबे समय से व्यावसायिक गतिविधियां संचालित हो रही हैं। अब इन पर कार्रवाई और सीलिंग के बाद व्यापारी वर्ग से लेकर आम नागरिक तक सवाल उठा रहे हैं।

नए मास्टर प्लान की मांग के बीच पुराना मास्टर प्लान चर्चा में

भोपाल में मौजूदा संकट के बीच लगातार नए मास्टर प्लान की मांग की जा रही है। लेकिन इस पूरे विवाद ने एक दूसरा सवाल भी खड़ा कर दिया है—क्या नए मास्टर प्लान के आने का इंतजार ही मौजूदा समस्या का समाधान है?

उपलब्ध जानकारी के मुताबिक, मास्टर प्लान-2005 भोपाल की करीब 25 लाख की अनुमानित आबादी को ध्यान में रखकर तैयार किया गया था। मौजूदा स्थिति में यह तर्क भी सामने आ रहा है कि शहर अभी उस अनुमानित आबादी के स्तर तक नहीं पहुंचा है, ऐसे में मौजूदा मास्टर प्लान के प्रावधानों को पूरी तरह लागू और प्रभावी किए बिना नए मास्टर प्लान की जरूरत पर सवाल उठना स्वाभाविक है।

हालांकि शहर के मौजूदा विस्तार, यातायात, पर्यावरण, आवास, व्यवसाय और आधारभूत संरचना की जरूरतों को देखते हुए नए मास्टर प्लान की आवश्यकता को लेकर सरकार का अपना दृष्टिकोण है।

सीलिंग कार्रवाई के बीच व्यापारियों की मुश्किलें बढ़ीं

रहवासी क्षेत्रों में व्यावसायिक गतिविधियों के खिलाफ कार्रवाई के बाद बड़ी संख्या में व्यापारी प्रभावित हुए हैं। व्यापारियों का तर्क है कि वर्षों से इन इलाकों में कारोबार संचालित हो रहे हैं और यदि नियमों के तहत किसी गतिविधि को संचालित करने की गुंजाइश थी, तो उसे पहले से स्पष्ट कर नियमित किया जाना चाहिए था।

दूसरी ओर, प्रशासनिक स्तर पर मास्टर प्लान, भूमि उपयोग और अन्य नियामकीय प्रावधानों के उल्लंघन के आधार पर कार्रवाई की जा रही है।

यही वजह है कि अब बहस केवल सीलिंग तक सीमित नहीं रही, बल्कि मास्टर प्लान के प्रावधानों को लागू करने में हुई कथित लापरवाही तक पहुंच गई है।

कांग्रेस ने लगाए गंभीर आरोप

मामले पर सियासत भी तेज हो गई है। कांग्रेस प्रदेश प्रवक्ता विक्रम चौधरी ने आरोप लगाया कि भोपाल के मौजूदा मास्टर प्लान-2005 के प्रावधानों की अनदेखी की गई।

उन्होंने आरोप लगाया कि अधिकारियों और सरकार ने मास्टर प्लान के प्रावधानों को लेकर व्यापारियों और जनता को गुमराह किया। कांग्रेस नेता ने यह भी आरोप लगाया कि मौजूदा मास्टर प्लान की अनदेखी के पीछे किसी बड़े षड्यंत्र की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता और सरकार व्यापारियों के नाम पर कैचमेंट क्षेत्र की जमीन और लैंड यूज में बदलाव करना चाहती है।

चौधरी ने इसे कथित तौर पर भ्रष्टाचार से जोड़ते हुए जांच की मांग की और कहा कि मौजूदा प्रावधान सामने आने के बाद नए मास्टर प्लान की आवश्यकता पर भी पुनर्विचार होना चाहिए।

इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है।

भाजपा ने कहा- व्यवस्थित विकास के लिए लाया जा रहा नया मास्टर प्लान

वहीं भाजपा प्रदेश प्रवक्ता महेश शर्मा ने कहा कि शहर के व्यवस्थित विकास के लिए नया मास्टर प्लान लाया जा रहा है। उन्होंने कहा कि मौजूदा मास्टर प्लान में मौजूद प्रावधानों का भी परीक्षण किया जाएगा और इन्हीं प्रावधानों को आधार बनाकर आगे निर्णय लिया जाएगा।

यानी सरकार की ओर से मौजूदा मास्टर प्लान के प्रावधानों को पूरी तरह नजरअंदाज करने के बजाय उनका परीक्षण करने की बात कही गई है।

असली सवाल: प्रावधान था तो अमल क्यों नहीं हुआ?

भोपाल के मौजूदा विवाद में सबसे अहम सवाल यही है कि जब मास्टर प्लान-2005 में आवासीय क्षेत्रों में निर्धारित सीमा और शर्तों के तहत व्यावसायिक गतिविधियों की गुंजाइश थी, तो इसे जमीन पर लागू क्यों नहीं किया गया?

यदि संबंधित विभाग समय रहते इन प्रावधानों का अध्ययन कर उनका पालन सुनिश्चित करते और वैध गतिविधियों को स्पष्ट नियमों के तहत नियमित करते, तो क्या आज बड़े पैमाने पर सीलिंग की नौबत आती?

अब जरूरत इस बात की है कि प्रशासन मौजूदा मास्टर प्लान के प्रावधानों को सार्वजनिक रूप से स्पष्ट करे, यह बताए कि किन गतिविधियों को कितनी सीमा तक अनुमति है और किन गतिविधियों को नियमों का उल्लंघन माना जाएगा। इससे व्यापारियों, आम नागरिकों और प्रशासन के बीच बना असमंजस काफी हद तक दूर हो सकता है।

भोपाल में चल रही सीलिंग की कार्रवाई ने एक पुराने मास्टर प्लान के ऐसे प्रावधान को फिर बहस के केंद्र में ला दिया है, जिस पर समय रहते अमल और व्यापक जागरूकता होती तो शायद आज की स्थिति अलग होती।

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