November 5, 2026

रायपुर। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने ठाकुर रामचंद्र जी स्वामी जैतूसाव मठ पब्लिक ट्रस्ट, रायपुर की संपत्तियों के राजस्व रिकॉर्ड में कलेक्टर का नाम मैनेजर या सर्वराकार के रूप में दर्ज किए जाने के खिलाफ दायर याचिका खारिज कर दी है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि मंदिर या धार्मिक संपत्ति के प्रबंधन का अधिकार रखने वाला पुजारी उस संपत्ति का स्वतंत्र मालिक नहीं बन जाता।

हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि राजस्व रिकॉर्ड में की गई प्रविष्टि से याचिकाकर्ता के सर्वराकार पद या ट्रस्ट की संपत्तियों पर उसके वास्तविक अधिकार का अंतिम निर्धारण नहीं होता। यदि सक्षम न्यायालय या प्राधिकारी के समक्ष याचिकाकर्ता अपना अधिकार साबित करता है, तो राजस्व प्रविष्टियां उस निर्णय के अधीन रहेंगी।

महंत राम आशीष दास ने दायर की थी याचिका

यह याचिका जैतूसाव मठ, पुरानी बस्ती रायपुर निवासी महंत राम आशीष दास ने दायर की थी। उन्होंने स्वयं को दिवंगत महंत राम भूषण दास का शिष्य बताते हुए वसीयत, गोद लेने के दस्तावेज और सर्वराकार के रूप में नियुक्ति संबंधी दस्तावेजों के आधार पर ट्रस्ट की संपत्तियों पर अपना अधिकार बताया था।

महंत राम भूषण दास का निधन 16 नवंबर 2007 को हुआ था। वे ट्रस्ट के सर्वराकार थे। याचिकाकर्ता ने अपने दस्तावेजों के आधार पर सर्वराकार के पद पर अपने अधिकार का दावा किया था।

ट्रस्ट की संपत्तियों के रिकॉर्ड में कलेक्टर का नाम दर्ज करने का मामला

मामले में महेंद्र कुमार अग्रवाल की ओर से ट्रस्ट की भरेंगा और भटगांव स्थित कृषि भूमि समेत अन्य संपत्तियों के राजस्व रिकॉर्ड से दिवंगत महंत का नाम हटाकर कलेक्टर का नाम दर्ज करने की मांग की गई थी।

इसी कार्रवाई को चुनौती देते हुए महंत राम आशीष दास ने हाईकोर्ट का रुख किया था।

हाईकोर्ट ने देरी को भी माना महत्वपूर्ण आधार

हाईकोर्ट ने कहा कि 28 अप्रैल 2016 के राजस्व मंडल के आदेश को चुनौती देने के लिए याचिका 28 अगस्त 2021 को दायर की गई, यानी पांच साल से अधिक की देरी के बाद। कोर्ट के अनुसार, इस देरी का संतोषजनक कारण भी याचिकाकर्ता की ओर से नहीं बताया गया।

कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि राजस्व रिकॉर्ड में किसी व्यक्ति या अधिकारी का नाम दर्ज होना संपत्ति के स्वामित्व अथवा धार्मिक ट्रस्ट के प्रबंधन के अधिकार का अंतिम फैसला नहीं होता।

पुजारी को संपत्ति का स्वतंत्र मालिक नहीं माना जा सकता

हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के पुजारी उत्थान एवं कल्याण समिति मामले में निर्धारित सिद्धांत का उल्लेख करते हुए कहा कि मंदिर या धार्मिक संपत्ति के प्रबंधन का अधिकार रखने वाला पुजारी उस संपत्ति का स्वतंत्र मालिक नहीं बन जाता।

अदालत ने माना कि राजस्व रिकॉर्ड में कलेक्टर का नाम दर्ज किए जाने से याचिकाकर्ता के सर्वराकार पद या ट्रस्ट की संपत्ति पर उसके वास्तविक अधिकार का अंतिम निर्धारण नहीं हुआ है। यदि याचिकाकर्ता सक्षम न्यायालय या प्राधिकारी के समक्ष अपने अधिकार को साबित करता है, तो राजस्व रिकॉर्ड संबंधित निर्णय के अनुरूप संशोधित हो सकते हैं।

इन आधारों पर हाईकोर्ट ने संविधान के अनुच्छेद 227 के तहत हस्तक्षेप करने से इनकार करते हुए याचिका खारिज कर दी।

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