May 16, 2026

हर साल लाखों छात्र प्रतियोगी परीक्षाओं में सिर्फ सवाल हल करने नहीं बैठते, बल्कि अपने सपनों, परिवार की उम्मीदों और बेहतर भविष्य की उम्मीद लेकर परीक्षा केंद्र तक पहुंचते हैं। किसी के लिए यह डॉक्टर बनने का सपना होता है, किसी के लिए घर की आर्थिक स्थिति सुधारने का मौका, तो किसी के लिए समाज में अपनी पहचान बनाने का रास्ता। लेकिन जब यही परीक्षाएं बार-बार पेपर लीक, तकनीकी गड़बड़ियों और प्रशासनिक लापरवाही की वजह से विवादों में घिरने लगें, तब सबसे बड़ा नुकसान सिर्फ परीक्षा का नहीं होता, बल्कि उस भरोसे का होता है जिस पर देश का युवा अपना भविष्य टिकाए बैठा है।

आज केंद्रीय शिक्षा मंत्री Dharmendra Pradhan ने नीट-यूजी 2026 परीक्षा रद्द करने और 21 जून को दोबारा परीक्षा कराने की घोषणा की। साथ ही यह भी कहा गया कि अगले साल से परीक्षा पूरी तरह कंप्यूटर आधारित होगी। सरकार का कहना है कि इससे पेपर लीक जैसी घटनाओं पर रोक लगेगी और परीक्षा प्रक्रिया ज्यादा सुरक्षित बनेगी। पहली नजर में यह फैसला सुधार की दिशा में एक बड़ा कदम लगता है, लेकिन इसके साथ कई गंभीर सवाल भी खड़े हो गए हैं।

सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या सिर्फ परीक्षा का तरीका बदल देने से पूरी व्यवस्था भरोसेमंद हो जाएगी? क्योंकि यह पहली बार नहीं है जब राष्ट्रीय परीक्षा एजेंसी (एनटीए) विवादों में आई हो। पिछले कुछ वर्षों में लगभग हर बड़ी परीक्षा किसी न किसी कारण से सवालों के घेरे में रही है। कभी पेपर लीक, कभी ग्रेस मार्क्स, कभी परिणामों पर विवाद, तो कभी परीक्षा केंद्रों की अव्यवस्था। 2024 में नीट का मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच गया था। लाखों छात्रों ने दोबारा परीक्षा की मांग की, लेकिन काउंसलिंग प्रक्रिया चलती रही। छात्रों के सामने सबसे बड़ी परेशानी यह थी कि वे विरोध करें, दोबारा तैयारी करें या अपने भविष्य को लेकर अगला फैसला लें।

2025 में भी हालात बहुत बेहतर नहीं रहे। कहीं प्रश्नपत्र देर से पहुंचे, कहीं परीक्षा देरी से शुरू हुई और कई जगह तकनीकी समस्याएं सामने आईं। हर बार कहा गया कि समस्या सीमित थी, लेकिन जिन छात्रों का भविष्य प्रभावित हुआ, उनके लिए यह कभी छोटी समस्या नहीं थी। सबसे बड़ा सवाल यही रहा कि जब परीक्षा की निष्पक्षता पर सवाल उठ चुके थे, तो समाधान कुछ केंद्रों तक ही सीमित क्यों रहा?

अब 2026 में फिर परीक्षा रद्द होना यह दिखाता है कि समस्या किसी एक साल की गलती नहीं है, बल्कि पूरी व्यवस्था की कमजोर होती विश्वसनीयता का संकेत है। करोड़ों छात्र जिस सिस्टम पर भरोसा करते हैं, वही लगातार सवालों में घिरता जा रहा है।

सरकार ने इसका समाधान कंप्यूटर आधारित परीक्षा को बताया है, लेकिन यहां भी कई चिंताएं हैं। एनटीए पहले से जेईई और नेट जैसी परीक्षाएं ऑनलाइन आयोजित करता रहा है। इन परीक्षाओं में भी सर्वर डाउन होने, तकनीकी खराबी, अलग-अलग शिफ्ट में प्रश्नपत्रों के कठिनाई स्तर को लेकर विवाद और परीक्षा केंद्रों की अव्यवस्था जैसी शिकायतें सामने आती रही हैं। ऐसे में छात्र और अभिभावक पूछ रहे हैं कि जब पहले से ऑनलाइन परीक्षाएं पूरी तरह विवादमुक्त नहीं हैं, तो क्या नीट में यह व्यवस्था वास्तव में सफल होगी?

छात्रों और अभिभावकों के मन में कई सवाल हैं। अगर परीक्षा के दौरान कंप्यूटर खराब हो जाए तो जिम्मेदारी कौन लेगा? इंटरनेट बाधित हो जाए तो नुकसान की भरपाई कौन करेगा? क्या ग्रामीण इलाकों के छात्रों को भी महानगरों जैसी तकनीकी सुविधाएं मिल पाएंगी? अलग-अलग शिफ्ट में परीक्षा होने पर क्या प्रश्नपत्रों का स्तर पूरी तरह समान रखा जा सकेगा? और सबसे अहम सवाल—क्या हर बार नई व्यवस्था का प्रयोग छात्रों के भविष्य पर ही किया जाएगा?

असल समस्या सिर्फ तकनीक की नहीं, बल्कि भरोसे की है। हर बार जब कोई परीक्षा रद्द होती है, तो सबसे बड़ी कीमत छात्र चुकाते हैं। वही फिर से तैयारी करते हैं, दोबारा परीक्षा देते हैं, मानसिक तनाव झेलते हैं और अपने भविष्य को लेकर अनिश्चितता में जीते हैं। अभिभावकों पर भी आर्थिक बोझ बढ़ता है। लेकिन जिन संस्थाओं और अधिकारियों की जिम्मेदारी निष्पक्ष और सुरक्षित परीक्षा कराना है, उनकी जवाबदेही शायद ही कभी तय होती दिखाई देती है।

एनटीए यह कह सकता है कि पुनर्परीक्षा बिना अतिरिक्त शुल्क के आयोजित होगी, लेकिन सच्चाई यह है कि इस पूरी प्रक्रिया का खर्च आखिरकार जनता के पैसे से ही आता है। यानी परीक्षा व्यवस्था की विफलताओं का आर्थिक बोझ भी आम नागरिक ही उठाते हैं।

यह मामला भारत की परीक्षा व्यवस्था के अत्यधिक केंद्रीकरण को भी दिखाता है। करोड़ों छात्रों का भविष्य कुछ घंटों की परीक्षा और एक एजेंसी पर निर्भर हो गया है। ऐसे में यदि वही एजेंसी बार-बार विवादों में घिरती है, तो केवल नई घोषणाओं और अस्थायी सुधारों से बात नहीं बनेगी। अब गंभीर संस्थागत सुधारों की जरूरत है। प्रश्नपत्र तैयार करने से लेकर मूल्यांकन तक पूरी प्रक्रिया की स्वतंत्र निगरानी, बाहरी ऑडिट और स्पष्ट जवाबदेही तय करनी होगी।

भारत दुनिया के सबसे युवा देशों में से एक है। यहां का युवा सिर्फ आंकड़ा नहीं, बल्कि देश की सबसे बड़ी ताकत है। लेकिन अगर वही युवा लगातार अव्यवस्था, अनिश्चितता और परीक्षा तंत्र की विफलताओं से जूझता रहेगा, तो इसका असर सिर्फ करियर तक सीमित नहीं रहेगा। धीरे-धीरे यह उस भरोसे को भी कमजोर करेगा, जिस पर किसी भी योग्यता आधारित व्यवस्था की नींव टिकी होती है।

प्रतियोगी परीक्षाएं किसी भी देश की विश्वसनीयता का आईना होती हैं। अगर उसी आईने पर बार-बार सवाल उठने लगें, तो सिर्फ छात्रों से धैर्य रखने की उम्मीद करना पर्याप्त नहीं है। अब जरूरत इस बात की है कि व्यवस्था खुद यह साबित करे कि मेहनत और योग्यता का मूल्य किसी पेपर लीक, तकनीकी खराबी या प्रशासनिक लापरवाही से बड़ा है।

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