डोंगरगढ़। डोंगरगढ़ जनपद की ग्राम पंचायतों में 15वें वित्त आयोग की राशि से पानी टैंकरों की खरीदी अब सवालों के घेरे में है। आरोप है कि GeM पोर्टल के जरिए हुई इस खरीदी में टैंकर की बाजार कीमत और पंचायतों द्वारा किए गए भुगतान के बीच बड़ा अंतर है। कुछ पंचायतों में करीब 2.50 लाख रुपये तक प्रति टैंकर भुगतान किए जाने की जानकारी सामने आई है।
मामला सिर्फ टैंकर की कीमत तक सीमित नहीं है। खरीदी के प्रस्ताव, GeM पर ऑर्डर, टैंकर की आपूर्ति, सामग्री सत्यापन और भुगतान की प्रक्रिया को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। सबसे बड़ा सवाल यह है कि यदि करीब 2500 लीटर क्षमता वाले कृषि टैंकर की बाजार कीमत लगभग 1.30 लाख रुपये बताई जा रही है, तो कुछ पंचायतों ने इसी क्षमता के टैंकर के लिए करीब 2.50 लाख रुपये का भुगतान क्यों किया?
हालांकि, बाजार कीमत और सरकारी भुगतान में अंतर के कारणों की आधिकारिक जांच या पुष्टि अभी सामने नहीं आई है।

1.30 लाख का टैंकर 2.50 लाख में क्यों?
उपलब्ध जानकारी के मुताबिक ग्राम पंचायत अछोली, सलोनी, तोतल भर्री, प्लांदुर, पिपरखार और मोहनपुर में करीब 2500 लीटर क्षमता वाले टैंकर के लिए 2.50 लाख रुपये तक के बिल सामने आने का दावा किया गया है।
यदि संबंधित टैंकरों की वास्तविक बाजार कीमत और भुगतान राशि में इतना बड़ा अंतर है, तो इसकी वजह जानना जांच का महत्वपूर्ण बिंदु होगा। इसके लिए GeM पर दर्ज उत्पाद, सप्लायर की दर, टैक्स इनवॉयस, परिवहन लागत और अन्य शुल्कों का मिलान करना जरूरी होगा।
टैंकर पहले पहुंचा, बाद में प्रस्ताव बनने का आरोप
पूरी प्रक्रिया पर सबसे गंभीर सवाल उन पंचायतों से सामने आए बयानों के बाद उठ रहे हैं, जहां कथित तौर पर टैंकर पहले पहुंचा और खरीदी का प्रस्ताव बाद में तैयार किया गया।
अछोली की सरपंच नंदकुमार साहू के अनुसार उन्हें GeM पोर्टल की प्रक्रिया की पूरी जानकारी नहीं थी और टैंकर पहले आ गया था। इसके बाद खरीदी की प्रक्रिया पूरी की गई।
वहीं ग्राम पंचायत अछोली की सचिव पूर्णिमा मंडावी ने बताया कि 15वें वित्त आयोग के तहत 2.50 लाख रुपये की लागत से पानी टैंकर खरीदा गया और खरीदी GeM पोर्टल के माध्यम से की गई।
यदि सामग्री की आपूर्ति प्रस्ताव और अधिकृत ऑर्डर से पहले हुई थी, तो यह जांच का विषय होगा कि टैंकर का ऑर्डर कब और किसके स्तर से दिया गया था।
पलानदूर में सत्यापन के बिना भुगतान का दावा
ग्राम पंचायत पलानदूर के सचिव हरिशचंद्र चंद्रवंशी के अनुसार पानी टैंकर आने के बाद खरीदी का प्रस्ताव भेजा गया। उन्होंने बताया कि इसकी स्वीकृत राशि 2.50 लाख रुपये है और सप्लाई जिला पंचायत सदस्य किरण साहू की ओर से की गई।
सचिव के अनुसार भुगतान से पहले सामग्री का सत्यापन अधिकृत अधिकारी द्वारा नहीं किया गया। यदि यह तथ्य रिकॉर्ड से भी पुष्ट होता है, तो भुगतान प्रक्रिया में निर्धारित नियमों के पालन को लेकर सवाल उठ सकते हैं।
एक ही जिले में टैंकरों की कीमत अलग-अलग
डोंगरगढ़ के बेलगांव और बोरतलाव क्षेत्र की पंचायतों में दो पहिया ट्रॉली वाले टैंकर के लिए करीब 2.50 लाख रुपये तक भुगतान की जानकारी सामने आई है।
वहीं मुरमुंदा क्षेत्र के धनडोंगरी और खल्लारी में चार पहिया टैंकर के लिए करीब 2.45 लाख रुपये भुगतान किए जाने का उल्लेख है।
ऐसे में जांच का एक अहम पहलू यह होगा कि अलग-अलग टैंकरों की क्षमता, बॉडी, उपकरण, ट्रॉली, परिवहन और अन्य तकनीकी specifications क्या थीं और कीमत निर्धारित करने का आधार क्या था।
सोलर फर्म से कृषि टैंकर की खरीदी पर भी सवाल
दस्तावेजों के मुताबिक कई पंचायतों ने भिलाई स्थित मेसर्स सिटी सोलर से शिवशक्ति एग्रो का वाटर टैंकर खरीदा।
यहां सवाल केवल यह नहीं है कि संबंधित फर्म GeM पर पंजीकृत थी या नहीं। जांच का विषय यह भी हो सकता है कि खरीदी से पहले बाजार दर, उत्पाद की गुणवत्ता और उपलब्ध अन्य विक्रेताओं की तुलना की गई थी या नहीं।
पंचायतों से मिले दस्तावेजों की पड़ताल में कुछ बिलों पर HSN कोड का कॉलम खाली होने की बात भी सामने आई है। हालांकि, इसकी वैधानिकता और GST/GeM नियमों के अनुरूपता का निर्धारण संबंधित दस्तावेजों और सक्षम विभाग की जांच के बाद ही हो सकेगा।
कमीशन के आरोप, लेकिन स्वतंत्र पुष्टि नहीं
मामले में प्रति टैंकर एक से डेढ़ लाख रुपये तक के कथित कमीशन के आरोप भी लगाए जा रहे हैं। इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि फिलहाल नहीं हुई है।
यदि जांच में सरकारी भुगतान और वास्तविक खरीद कीमत के बीच असामान्य अंतर सामने आता है, तो यह भी पता लगाना होगा कि अतिरिक्त राशि का लाभ किसे मिला और भुगतान की स्वीकृति किस स्तर पर हुई।
इसके लिए पंचायतों के प्रस्ताव, प्रशासनिक स्वीकृति, GeM ऑर्डर, वेंडर विवरण, टैक्स इनवॉयस, भुगतान रिकॉर्ड और सामग्री सत्यापन रिपोर्ट की जांच महत्वपूर्ण होगी।
सरकारी टैंकरों पर जनप्रतिनिधियों के नाम लिखने का भी मुद्दा
खरीदे गए कुछ टैंकरों की बॉडी पर संबंधित जनप्रतिनिधियों के नाम लिखे जाने को लेकर भी सवाल उठाए जा रहे हैं।
यदि सामग्री का भुगतान पूरी तरह सरकारी राशि से हुआ है, तो उस पर किसी जनप्रतिनिधि के नाम या व्यक्तिगत विकास कार्य के तौर पर प्रचार किए जाने की वैधानिकता और औचित्य की भी जांच की जा सकती है।
जांच से सामने आ सकती है पूरी प्रक्रिया
फिलहाल पूरे मामले में पंचायत प्रस्ताव, प्रशासनिक स्वीकृति, GeM ऑर्डर, सप्लायर की जानकारी, टैक्स इनवॉयस, HSN विवरण, भुगतान रिकॉर्ड, टैंकर की वास्तविक कीमत और सामग्री सत्यापन जैसे दस्तावेजों की जांच की जरूरत है।
इन दस्तावेजों के मिलान के बाद ही स्पष्ट होगा कि टैंकरों की कीमत बाजार दर से अधिक क्यों थी और खरीदी की प्रक्रिया निर्धारित नियमों के अनुरूप हुई या नहीं।
खैरागढ़ में भी टैंकर खरीदी पर उठ चुके हैं सवाल
ऐसा ही मामला खैरागढ़ जिले में भी सामने आने की जानकारी है, जहां टैंकर खरीदी में कथित अनियमितता के आरोप लगाए गए हैं।
बताया जा रहा है कि करीब 5000 लीटर क्षमता वाले ट्रैक्टर-ट्रॉली टैंकर की कीमत लगभग 1.80 से 2 लाख रुपये के आसपास बताई जाती है, जबकि वहां एक टैंकर के लिए करीब 3 लाख रुपये की राशि स्वीकृत किए जाने का दावा है।
डोंगरगढ़ और खैरागढ़ के मामलों में वास्तविक कीमत, स्वीकृत राशि और भुगतान की तुलना के साथ-साथ खरीदी प्रक्रिया की स्वतंत्र जांच होने पर ही स्थिति पूरी तरह स्पष्ट हो सकेगी।
फिलहाल डोंगरगढ़ में सबसे बड़ा सवाल यही है कि 15वें वित्त की सरकारी राशि से खरीदे गए टैंकरों की कीमत तय करने का आधार क्या था और यदि प्रक्रिया में कोई अनियमितता हुई है तो उसकी जिम्मेदारी किसकी होगी?