September 14, 2026

दुर्ग। हेमचंद यादव विश्वविद्यालय, दुर्ग के कुलपति प्रो. (डॉ.) संजय तिवारी के खिलाफ प्राप्त वित्तीय, प्रशासनिक और मूल्यांकन संबंधी शिकायतों की जांच अब निर्णायक दौर में पहुंचती नजर आ रही है। राज्यपाल सचिवालय की ओर से शिकायतों से संबंधित नस्तियां, नोटशीट और अभिलेख प्रस्तुत करने के लिए दी गई समय-सीमा समाप्त होने के बाद जांच समिति के सदस्य विश्वविद्यालय पहुंचे हैं।

बताया जा रहा है कि समिति विश्वविद्यालय में उपलब्ध संबंधित दस्तावेजों और अभिलेखों की मौके पर जांच कर रही है। इस घटनाक्रम के बाद विश्वविद्यालय के प्रशासनिक गलियारों में भी हलचल बढ़ गई है।

राज्यपाल सचिवालय ने गठित की थी उच्चस्तरीय जांच समिति

कुलपति डॉ. संजय तिवारी के खिलाफ मिली शिकायतों की गंभीरता को देखते हुए छत्तीसगढ़ के राज्यपाल एवं विश्वविद्यालय के कुलाधिपति ने उच्चस्तरीय जांच समिति का गठन किया था। राज्यपाल के सचिव डॉ. सीआर प्रसन्ना ने 30 जुलाई को इस संबंध में आदेश जारी किया था।

बताया गया है कि दुर्ग ग्रामीण विधायक और छत्तीसगढ़ राज्य पिछड़ा वर्ग आयोग के अध्यक्ष ललित चंद्राकर ने कुलपति के खिलाफ विभिन्न बिंदुओं को लेकर कुलाधिपति के समक्ष शिकायत प्रस्तुत की थी। इसके बाद शिकायतों की जांच की प्रक्रिया शुरू हुई।

24 अगस्त तक मांगे गए थे दस्तावेज

विश्वविद्यालय सूत्रों के अनुसार, राज्यपाल सचिवालय ने 19 अगस्त 2026 को पत्र जारी कर शिकायतों की जांच के लिए आवश्यक दस्तावेज, नस्तियां और अभिलेख जांच समिति को उपलब्ध कराने के निर्देश दिए थे। इसके लिए 24 अगस्त 2026 तक की समय-सीमा तय की गई थी।

बताया जाता है कि कुलपति की ओर से विभिन्न विभागों से अभिलेख जुटाने और उच्च शिक्षा विभाग से संबंधित जानकारी प्राप्त करने के लिए RTI आवेदन किए जाने का हवाला देते हुए समय-सीमा बढ़ाकर 31 अगस्त 2026 करने का अनुरोध किया गया था।

हालांकि, निर्धारित अवधि समाप्त होने के बाद भी अपेक्षित दस्तावेज जांच समिति के समक्ष प्रस्तुत नहीं किए जाने की बात सामने आई है। इसके बाद समिति के सदस्यों के विश्वविद्यालय पहुंचकर उपलब्ध रिकॉर्ड की जांच करने की जानकारी सामने आई है।

विधायक ललित चंद्राकर ने लगाए हैं कई गंभीर आरोप

विधायक ललित चंद्राकर की ओर से राज्यपाल को भेजी गई शिकायत में कुलपति के खिलाफ वित्तीय, प्रशासनिक और शैक्षणिक अनियमितताओं के कई आरोप लगाए गए हैं। इन आरोपों की फिलहाल जांच की जा रही है।

12 लाख से ज्यादा उत्तरपुस्तिकाओं की खरीदी पर सवाल

शिकायत में कहा गया है कि विश्वविद्यालय ने मार्च 2026 में करीब 12 लाख से अधिक उत्तरपुस्तिकाओं की खरीदी के लिए निविदा जारी की थी।

शिकायतकर्ता का आरोप है कि शासकीय फर्म ‘संवाद’ ने न्यूनतम दर प्रस्तुत की थी, इसके बावजूद कुलपति की ओर से एक निजी फर्म के पक्ष में अर्धशासकीय पत्र जारी कर कार्य आवंटित करने की अनुशंसा की गई। इसके बाद कथित तौर पर उसी निजी फर्म को काम दिया गया और करीब 40 लाख रुपये से अधिक का भुगतान किया गया।

शिकायत में इसे निविदा प्रक्रिया और वित्तीय नियमों के विपरीत बताया गया है। इन आरोपों की जांच समिति द्वारा की जा रही है।

नए पाठ्यक्रमों की मान्यता को लेकर भी शिकायत

शिकायत में विश्वविद्यालय द्वारा MBA, MCA, PGD-BM समेत 8 नए पाठ्यक्रम शुरू करने के लिए AICTE और RCI से निरीक्षण कराए जाने का भी उल्लेख है।

शिकायतकर्ता का आरोप है कि इन प्रक्रियाओं से पहले राज्य शासन से आवश्यक अनुमति नहीं ली गई। साथ ही एक ही विभागीय संरचना को परिवर्तित स्वरूप में प्रस्तुत कर अलग-अलग पाठ्यक्रमों के लिए मान्यता प्राप्त करने का प्रयास किए जाने का भी दावा किया गया है।

बिना निविदा किताबों की खरीदी का आरोप

शिकायत में नए पाठ्यक्रमों के लिए पुस्तकों की खरीदी पर भी सवाल उठाए गए हैं। आरोप है कि बिना विधिवत निविदा प्रक्रिया के मौखिक निर्देश पर करीब 40 लाख रुपये की 380 पुस्तकें खरीदी गईं।

शिकायतकर्ता ने पुस्तकों की कीमत और खरीदी की प्रक्रिया दोनों की जांच की मांग की है।

अतिथि शिक्षकों की नियुक्ति पर भी सवाल

शिकायत के मुताबिक, विश्वविद्यालय में अतिथि व्याख्याताओं की नियुक्ति आम तौर पर शैक्षणिक सत्र शुरू होने के बाद की जाती है। आरोप है कि कुलपति ने मई में ही 5 विषयों के लिए 15 अतिथि शिक्षकों की नियुक्ति कर दी, जबकि संबंधित विभाग उस समय विधिवत अस्तित्व में नहीं थे और उनमें विद्यार्थियों का प्रवेश भी नहीं हुआ था।

शिकायतकर्ता ने ऐसे में अतिथि शिक्षकों के वेतन भुगतान के स्रोत और नियुक्तियों के औचित्य की जांच की मांग की है।

कार्यपरिषद की स्वीकृति के बिना वित्तीय फैसलों का आरोप

शिकायत में यह भी आरोप लगाया गया है कि विश्वविद्यालय के कई महत्वपूर्ण और वित्तीय मामलों को कार्यपरिषद के समक्ष अनुमोदन के लिए प्रस्तुत नहीं किया गया। शिकायतकर्ता का कहना है कि निर्धारित सीमा से अधिक राशि की खरीदी और वित्तीय निर्णयों के लिए कार्यपरिषद की स्वीकृति आवश्यक होती है।

इन आरोपों को शिकायत में विश्वविद्यालय अधिनियम और प्रशासनिक प्रक्रिया के विपरीत बताया गया है।

अब जांच समिति की रिपोर्ट पर नजर

फिलहाल कुलपति के खिलाफ लगाए गए आरोप शिकायत का हिस्सा हैं और उनकी स्वतंत्र पुष्टि होना बाकी है। जांच समिति द्वारा विश्वविद्यालय पहुंचकर दस्तावेजों और रिकॉर्ड की पड़ताल की जा रही है। जांच के बाद समिति की रिपोर्ट और संबंधित अधिकारियों का पक्ष सामने आने पर ही आरोपों की वास्तविक स्थिति स्पष्ट हो सकेगी।

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