MP High Court: मध्यप्रदेश के ग्वालियर-चंबल अंचल में करीब 45 साल पहले लागू किए गए ‘मध्य प्रदेश डाका और व्यपहरण प्रभावित क्षेत्र अधिनियम’ की वैधानिकता को हाईकोर्ट में चुनौती दी गई है। प्रदेश के पूर्व गृह मंत्री डॉ. गोविंद सिंह की ओर से दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट ने राज्य सरकार और पुलिस के वरिष्ठ अधिकारियों से जवाब तलब किया है।
अदालत ने प्रमुख सचिव गृह, प्रमुख सचिव विधि, ग्वालियर-चंबल अंचल के आईजी और डीआईजी समेत 7 जिलों के पुलिस अधीक्षकों सहित 11 वरिष्ठ अधिकारियों को नोटिस जारी किया है।

आम आपराधिक मामलों में कानून के इस्तेमाल पर सवाल
याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता राजीव शर्मा ने कोर्ट में दलील दी कि सरकार ने विधानसभा में खुद स्वीकार किया है कि 2007 के बाद प्रदेश में कोई नया सूचीबद्ध डकैत नहीं बना है और वर्तमान में कोई सक्रिय डकैत गिरोह नहीं है।
याचिका में आरोप लगाया गया है कि इसके बावजूद पुलिस सामान्य आपराधिक मामलों में भी इस कानून की कड़ी धाराओं 11 और 13 का इस्तेमाल कर रही है। याचिकाकर्ता ने इस कानून के मौजूदा उपयोग और इसकी प्रासंगिकता पर सवाल उठाते हुए कहा है कि जिन परिस्थितियों को ध्यान में रखकर कानून बनाया गया था, वे अब बदल चुकी हैं।
‘परिस्थितियां बदल गईं तो कानून की जरूरत क्यों?’
याचिका में तर्क दिया गया है कि कानून किसी विशेष सामाजिक और आपराधिक परिस्थिति से निपटने के उद्देश्य से बनाए जाते हैं। यदि समय के साथ वे परिस्थितियां समाप्त हो जाएं और कानून का मूल उद्देश्य अप्रासंगिक हो जाए, तो उसकी आवश्यकता और वैधानिकता पर पुनर्विचार किया जाना चाहिए।
पूर्व गृह मंत्री की याचिका में दावा किया गया है कि ग्वालियर-चंबल क्षेत्र की वर्तमान स्थिति दशकों पहले जैसी नहीं है, ऐसे में इस कानून के प्रावधानों के इस्तेमाल की समीक्षा जरूरी है।
FIR और पुलिस को मिले विशेष अधिकारों पर भी सवाल
याचिका में इस अधिनियम के तहत दर्ज की जाने वाली FIR, पुलिस को प्राप्त विशेष अधिकारों और किसी क्षेत्र को ‘डकैती प्रभावित क्षेत्र’ घोषित करने की प्रक्रिया की वैधानिकता पर भी सवाल उठाए गए हैं।
याचिकाकर्ता ने हाईकोर्ट से इन प्रावधानों की मौजूदा संवैधानिक और कानूनी व्यवस्था के संदर्भ में जांच करने की मांग की है।
ग्वालियर-चंबल के 7 जिलों के पुलिस अधिकारी पक्षकार
मामले में ग्वालियर, भिंड, मुरैना, शिवपुरी, श्योपुर और दतिया समेत संबंधित क्षेत्र के पुलिस अधीक्षकों को पक्षकार बनाया गया है। हाईकोर्ट के नोटिस के बाद अब राज्य सरकार और पुलिस अधिकारियों को इस कानून के औचित्य, इसके प्रावधानों और मौजूदा समय में इसके इस्तेमाल को लेकर अपना पक्ष रखना होगा।
फिलहाल हाईकोर्ट ने कानून को असंवैधानिक घोषित नहीं किया है। अदालत ने केवल याचिका पर संबंधित पक्षों से जवाब मांगा है। आगे की सुनवाई में यह स्पष्ट होगा कि हाईकोर्ट इस पुराने कानून और इसकी धाराओं की वैधानिकता को किस नजरिए से देखता है।