May 16, 2026

वीरेन्द्र गहवई, बिलासपुर। नारायणपुर के चर्चित नक्सल मामले में आरोपियों को मिली डिफॉल्ट बेल के खिलाफ राज्य सरकार को हाईकोर्ट से बड़ा झटका लगा है। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने सरकार की अपील को यह कहते हुए खारिज कर दिया कि केवल सरकारी प्रक्रियाओं और फाइलों के लंबित रहने का हवाला देकर देरी को उचित नहीं ठहराया जा सकता। मुख्य न्यायाधीश Ramesh Sinha और न्यायमूर्ति Ravindra Kumar Agrawal की खंडपीठ ने 182 दिन की देरी को लापरवाहीपूर्ण और अस्पष्टीकृत मानते हुए अपील को समयसीमा से बाधित बताकर खारिज कर दिया।

यह मामला नारायणपुर जिले के ओरछा थाना क्षेत्र में दर्ज एक नक्सल प्रकरण से जुड़ा है। इस मामले में चंपा कर्मा, मांगी मंडावी, संकू मंडावी और लच्छू मंडावी के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता, आर्म्स एक्ट और गैरकानूनी गतिविधि (निवारण) अधिनियम (यूएपीए) की गंभीर धाराओं के तहत केस दर्ज किया गया था। विशेष न्यायाधीश, एनआईए एक्ट एवं अनुसूचित अपराध न्यायालय, नारायणपुर ने 11 और 24 सितंबर 2025 को आरोपियों को डिफॉल्ट बेल दे दी थी। इसके खिलाफ राज्य सरकार ने हाईकोर्ट में अपील दायर की, लेकिन यह अपील निर्धारित समयसीमा से 182 दिन देरी से दाखिल हुई।

राज्य सरकार की ओर से अतिरिक्त महाधिवक्ता ने कोर्ट में दलील दी कि विधि एवं विधायी कार्य विभाग से प्रस्ताव आने, शासन की मंजूरी मिलने, दस्तावेज जुटाने और विभिन्न प्रशासनिक प्रक्रियाओं में समय लगने के कारण देरी हुई। उन्होंने कहा कि सरकारी व्यवस्था बहुस्तरीय होती है, इसलिए औपचारिकताओं के चलते विलंब स्वाभाविक था।

हालांकि, हाईकोर्ट ने इस तर्क को स्वीकार नहीं किया। कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के कई महत्वपूर्ण फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि कानून द्वारा तय समयसीमा सभी पर समान रूप से लागू होती है और सरकार को केवल “रेड टेप” या फाइलों की प्रक्रिया का हवाला देकर विशेष राहत नहीं दी जा सकती।

खंडपीठ ने Postmaster General vs Living Media India Ltd और State of Madhya Pradesh vs Ramkumar Choudhary मामलों का उल्लेख करते हुए कहा कि देरी माफी कोई अधिकार नहीं, बल्कि अपवाद है। यदि देरी के पीछे पर्याप्त, ठोस और संतोषजनक कारण प्रस्तुत नहीं किए जाते, तो अदालत देरी को स्वीकार नहीं कर सकती।

अपने आदेश में हाईकोर्ट ने स्पष्ट कहा कि राज्य सरकार देरी के लिए कोई विश्वसनीय और ठोस कारण प्रस्तुत करने में विफल रही। केवल यह कहना कि फाइलें विभिन्न विभागों में लंबित थीं, पर्याप्त नहीं माना जा सकता। कोर्ट ने यह भी कहा कि सरकारी विभागों की जिम्मेदारी और अधिक बढ़ जाती है कि वे समयसीमा के भीतर गंभीरता और तत्परता से कार्य करें। यदि सरकारी मशीनरी लापरवाही बरतती है, तो उसका लाभ उसे नहीं दिया जा सकता।

अंततः अदालत ने 182 दिन की देरी माफ करने से इनकार करते हुए देरी माफी आवेदन खारिज कर दिया। इसके साथ ही राज्य सरकार की अपील भी समयसीमा से बाधित मानते हुए स्वतः निरस्त हो गई।

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