जगदलपुर। विश्व प्रसिद्ध बस्तर दशहरा इस बार अपनी ऐतिहासिक परंपराओं के साथ-साथ लगातार हो रहे हादसों और विवादों को लेकर भी चर्चा में है। भीतर रैनी की रस्म से पहले बीती रात आठ चक्कों वाले विजय रथ को खींचने के दौरान बड़ा हादसा हो गया। रथ के पहिए की चपेट में आने से बास्तानार के गुड़ियापारा निवासी खोपा कश्यप की मौत हो गई, जबकि इसी गांव के सुखराम मंडावी का पैर कट गया। दोनों ग्रामीण रथ खींचने के लिए पहुंचे थे।

हादसे के बाद मौके पर अफरा-तफरी मच गई और रथ की गतिविधियां रोकनी पड़ीं। इसी दौरान आईजी बंगले के पास रथ को कुम्हड़ाकोट ले जाते समय एक अन्य व्यक्ति का हाथ दबने की घटना भी सामने आई। हादसे में घायल दोनों लोगों की हालत खतरे से बाहर बताई जा रही है।
करीब 200 ग्रामीण पहुंचे थे रथ खींचने
बस्तर दशहरा में विजय रथ खींचने की परंपरा में हर साल बड़ी संख्या में ग्रामीण शामिल होते हैं। इस बार भी करीब 200 लोग रथ खींचने पहुंचे थे। हालांकि, इस साल रथ यात्रा के दौरान यह पहला हादसा नहीं है। इससे पहले भी फूल रथ और विजय रथ से जुड़ी घटनाएं सामने आ चुकी हैं।
16 अक्टूबर को बिजली के खंभे से टकराया था फूल रथ
16 अक्टूबर को फूल रथ बिजली के खंभे से टकरा गया था। खंभा गिरने से करीब एक दर्जन लोग घायल हो गए थे। इसके बाद 18 अक्टूबर को फूल रथ निर्माणाधीन विजय रथ से जा टकराया। टक्कर में फूल रथ का अगला पहिया टूट गया था।
इस घटना के बाद पुलिस और रथ खींचने पहुंचे ग्रामीणों के बीच विवाद हो गया। काफी मशक्कत के बाद स्थिति शांत कराई गई। बाद में जेसीबी और क्रेन की मदद से फूल रथ की परिक्रमा पूरी कराई गई। बताया गया कि अंतिम परिक्रमा के दौरान पहिया टूटने के बावजूद रथ खींचने पर जोर देने को लेकर पुलिस और ग्रामीणों के बीच झड़प हुई थी।
लगातार हादसों से सुरक्षा व्यवस्था पर सवाल
21 अक्टूबर को विजय रथ की परिक्रमा होनी थी, लेकिन माता दंतेश्वरी का छत्र रथ पर विराजित होने से पहले ही हादसा हो गया। रथ के पहिए की चपेट में आने से खोपा कश्यप की जान चली गई और सुखराम मंडावी गंभीर रूप से घायल हो गए। वहीं, रथ को कुम्हड़ाकोट ले जाने के दौरान एक अन्य व्यक्ति का हाथ दबने की घटना भी हुई।
बस्तर दशहरा अपनी विशिष्ट परंपराओं और जनभागीदारी के लिए देश-दुनिया में प्रसिद्ध है। विजय रथ खींचने की रस्म में ग्रामीण बड़ी संख्या में आस्था के साथ हिस्सा लेते हैं। लेकिन इस बार लगातार सामने आए हादसों ने सुरक्षा इंतजामों पर सवाल खड़े कर दिए हैं।
ऐसे में अब यह जरूरी हो गया है कि हजारों लोगों की मौजूदगी और सैकड़ों ग्रामीणों की भागीदारी वाली इस ऐतिहासिक परंपरा के दौरान सुरक्षा व्यवस्था को और मजबूत किया जाए, ताकि आस्था और परंपरा के इस आयोजन में ऐसी दर्दनाक घटनाओं की पुनरावृत्ति न हो।