सुप्रीम कोर्ट से कारोबारी विजय कुमार केला को बड़ी राहत
Vijay Kumar Kela को एक महत्वपूर्ण कानूनी मामले में बड़ी राहत देते हुए Supreme Court of India ने उनके खिलाफ दर्ज सीबीआई एफआईआर, चार्जशीट और निचली अदालत के आदेश को रद्द कर दिया है।

क्या कहा सुप्रीम कोर्ट ने?
B. V. Nagarathna और Ujjal Bhuyan की पीठ ने कहा कि:
- जब बैंक और कर्जदार के बीच ऋण खाते का निपटारा (Settlement) आपसी सहमति से हो चुका हो।
- और उस समझौते को Debt Recovery Tribunal की मंजूरी भी मिल चुकी हो।
- तब उसी मामले में बाद में धोखाधड़ी का आपराधिक मुकदमा चलाना न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग माना जा सकता है।
अदालत ने यह भी टिप्पणी की कि वाणिज्यिक विवादों के समाधान के बाद भी यदि आपराधिक मामले जारी रखे जाएं, तो इससे बैंकिंग और आर्थिक व्यवस्था पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है तथा लोग वन-टाइम सेटलमेंट (OTS) जैसे विकल्पों से बचने लगेंगे।
मामला क्या था?
- UCO Bank से मेसर्स मोहन ट्रेडर्स ने ऋण लिया था।
- वर्ष 2009 तक बकाया राशि लगभग 8 करोड़ रुपये पहुंच गई थी।
- फर्म का संचालन विजय कुमार केला के बड़े भाई स्वर्गीय Parmanand Kela करते थे।
- उनके निधन के बाद कारोबार प्रभावित हुआ और ऋण चुकाने में कठिनाई आई।
- बैंक ने 2010 में खाते को एनपीए घोषित कर दिया और मामला डीआरटी में पहुंचा।
- बाद में 6.49 करोड़ रुपये के बकाया के बदले 4.25 करोड़ रुपये में फुल एंड फाइनल सेटलमेंट हुआ।
सीबीआई की कार्रवाई
सेटलमेंट और खाता बंद होने के करीब ढाई साल बाद बैंक के एक वरिष्ठ अधिकारी की शिकायत पर Central Bureau of Investigation ने आरोप लगाया कि:
- ऋण सीमा बढ़ाने के लिए कथित रूप से फर्जी ऑडिट रिपोर्ट प्रस्तुत की गई थी।
- बैंक अधिकारियों के साथ मिलीभगत कर गिरवी संपत्तियों से संबंधित अनियमितताएं की गई थीं।
इसके आधार पर सीबीआई ने एफआईआर दर्ज कर विशेष अदालत में चार्जशीट दाखिल की थी। बाद में मामला High Court of Chhattisgarh से होते हुए सुप्रीम कोर्ट पहुंचा।
फैसले का महत्व
यह निर्णय बैंक ऋण, वन-टाइम सेटलमेंट और आर्थिक अपराधों से जुड़े मामलों में एक महत्वपूर्ण नजीर माना जा रहा है। अदालत ने संकेत दिया है कि जिन मामलों में वित्तीय विवाद का वैधानिक समाधान हो चुका है, वहां आपराधिक कार्रवाई को सावधानीपूर्वक परखा जाना चाहिए ताकि न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग न हो।