उज्जैन। अवन्तिका (उज्जैन) के गीता भवन में आयोजित तीन दिवसीय ‘युवा धर्म संसद-2026’ के दूसरे दिन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने युवाओं से सीधा संवाद किया। दीप प्रज्वलन और भारत माता व स्वामी विवेकानंद के चित्र पर पुष्प अर्पित कर सत्र की शुरुआत हुई।

देश के 24 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों से पहुंचे 1600 से अधिक युवा, विद्यार्थी और शिक्षक इस संवाद में शामिल हुए। डॉ. भागवत ने धर्म के व्यापक स्वरूप, प्रकृति के प्रति जिम्मेदारी और जीवन को सार्थक बनाने जैसे विषयों पर अपने विचार रखे।
धर्म उम्र की मोहताज नहीं
डॉ. मोहन भागवत ने कहा कि धर्म को केवल बुढ़ापे या जीवन के अंतिम पड़ाव से जोड़कर देखना उचित नहीं है। उनके अनुसार धर्म जीवन के प्रारंभ से अंत तक मनुष्य के साथ रहने वाला परम सत्य है। इसे समझने के लिए पूर्वाग्रहों से बाहर निकलना जरूरी है।
उन्होंने कहा कि पश्चिमी सभ्यताओं ने पंथ और पूजा पद्धति के संदर्भ में धर्म को ‘रिलिजन’ के रूप में समझा, जबकि धर्म का स्वरूप इससे व्यापक है। उनके मुताबिक धर्म पूरी सृष्टि को धारण करने वाला शाश्वत नियम और व्यवस्था है। यह बंधन नहीं बल्कि मुक्ति का मार्ग है।
मधुमक्खी का उदाहरण देकर समझाया संतुलन
प्रकृति और मनुष्य के संबंध को समझाते हुए डॉ. भागवत ने मधुमक्खी का उदाहरण दिया। उन्होंने कहा कि मधुमक्खी फूल से रस लेती है, लेकिन फूल को नुकसान नहीं पहुंचाती।
उन्होंने इसी उदाहरण के जरिए अधिकारों के साथ जिम्मेदारी के भाव पर जोर दिया। उनके अनुसार मनुष्य बुद्धि के कारण प्रकृति में श्रेष्ठ भूमिका रखता है, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि वह प्रकृति का विनाश करे। सभी के कल्याण के साथ आगे बढ़ना ही वास्तविक सफलता है।
‘यशस्वी नहीं, सार्थक बनें’
डॉ. भागवत ने युवाओं से केवल धन और प्रसिद्धि की दौड़ में शामिल होने के बजाय जीवन को सार्थक बनाने का आह्वान किया। उन्होंने संवेदना, करुणा और सेवा भाव को जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा बताया।
उन्होंने कहा कि करोड़ों रुपये कमाने के बाद भी व्यक्ति अशांत रह सकता है, लेकिन धार्मिक और सेवाभाव के साथ जिया गया जीवन दूसरों के लिए प्रेरणा बन सकता है।
19 सितंबर को मुख्यमंत्री की मौजूदगी में समापन
युवा धर्म संसद के दूसरे दिन के कार्यक्रम में स्वामी अवधेशानंद महाराज (जूना अखाड़ा), आचार्य मिथिलेश नंदिनी शरण महाराज, पद्म भूषण राम बहादुर राय (अध्यक्ष, IGNCA), आचार्य पुंडरीक गोस्वामी महाराज, प्रो. श्रीनिवास वरखेड़ी (कुलपति, केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय), गीतकार एवं पटकथा लेखक मनोज मुंतशिर शुक्ला, प्रो. हिमांशु राय (निदेशक, IIM इंदौर), मातृश्री स्मृति अनंत लक्ष्मी, डॉ. इंदुमती काटदरे और डॉ. आनंद रंगनाथन सहित कई विशिष्ट लोग मौजूद रहे।
कार्यक्रम का समापन 19 सितंबर को मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव की विशेष उपस्थिति में होने की जानकारी दी गई है।