September 14, 2026

बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने आदिवासी भूमि से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में स्पष्ट किया है कि सिर्फ जमीन का रजिस्टर्ड बिक्री विलेख किसी आदिवासी व्यक्ति के नाम होने से गैर-आदिवासी के वास्तविक कब्जे या उपयोग की जांच पर रोक नहीं लगती। कोर्ट ने कहा कि छत्तीसगढ़ भू-राजस्व संहिता की धारा 170-बी का उद्देश्य आदिवासी भूमि को ऐसे लोगों के कब्जे और उपयोग से बचाना है, जो कानूनन उसके हकदार नहीं हैं।

हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच ने सिंगल बेंच के 20 मार्च 2024 के आदेश को बरकरार रखते हुए अपील खारिज कर दी। साथ ही एसडीएम, कलेक्टर और कमिश्नर कोर्ट द्वारा पारित आदेशों को भी कायम रखा गया।

राजस्व अधिकारी कर सकते हैं लेनदेन की वास्तविकता की जांच

कोर्ट ने कहा कि धारा 170-बी के तहत राजस्व अधिकारी केवल दस्तावेजों में दर्ज नाम तक सीमित नहीं हैं। वे जमीन के वास्तविक कब्जे, उपयोग और लेनदेन की परिस्थितियों की जांच कर सकते हैं।

अदालत के मुताबिक, इस प्रावधान का मकसद आदिवासी भूमि को ऐसे व्यक्तियों के कब्जे या उपयोग से सुरक्षित रखना है, जो उस भूमि पर अधिकार नहीं रखते। इसलिए यदि रिकॉर्ड में जमीन किसी आदिवासी व्यक्ति के नाम दर्ज है, लेकिन वास्तविक कब्जा किसी गैर-आदिवासी के पास है, तो इसकी जांच की जा सकती है।

नया बाराद्वार की जमीन से जुड़ा है मामला

मामला ग्राम नया बाराद्वार की एक जमीन से संबंधित है। यह भूमि मूल रूप से लतीराम के नाम दर्ज थी। बाद में उनके बेटे धनीराम के नाम पर इसका रिकॉर्ड हुआ।

धनीराम ने 23 मई 1979 को पांच हजार रुपये में रजिस्टर्ड बिक्री विलेख के जरिए जमीन आदिवासी समुदाय के फिरतू राम के पक्ष में हस्तांतरित की थी। फिरतू राम की मृत्यु के बाद जमीन गोकुल राम के नाम दर्ज हुई।

गोकुल राम की मृत्यु के बाद उनके कानूनी वारिस रामलाल, रामकुमार, कन्हैया, छोटेलाल, पूर्णिमा कुमारी, बुंदकुंवर और उषा इस मामले में वर्तमान अपीलकर्ता बने।

जानकी बाई ने धारा 170-बी के तहत की शिकायत

मामले में जानकी बाई ने छत्तीसगढ़ भू-राजस्व संहिता की धारा 170-बी के तहत शिकायत दर्ज कराई। उनका कहना था कि राजस्व रिकॉर्ड में जमीन आदिवासी व्यक्तियों के नाम दर्ज होने के बावजूद उसका वास्तविक कब्जा और उपयोग गैर-आदिवासी लखनलाल राठौर, निवासी डेरागढ़, सक्ती के पास है।

शिकायत के बाद एसडीएम ने पटवारी की रिपोर्ट, संबंधित पक्षों को जारी नोटिस, उनके बयान और गवाहों के कथनों के आधार पर जांच की। इसके बाद 30 मार्च 1998 को जमीन आदिवासी के पक्ष में वापस करने का आदेश जारी किया गया।

कलेक्टर से लेकर रेवेन्यू बोर्ड तक आदेश बरकरार

गोकुल राम की अपील पर कलेक्टर ने एसडीएम के आदेश को रद्द करते हुए मामले को दोबारा सुनवाई के लिए भेज दिया। पुनः सुनवाई के बाद एसडीएम ने 11 फरवरी 2003 को फिर से जमीन आदिवासी के पक्ष में वापस करने का आदेश दिया।

इसके बाद कलेक्टर ने 3 मार्च 2004 और कमिश्नर ने 30 नवंबर 2009 को एसडीएम के आदेश को बरकरार रखा। रेवेन्यू बोर्ड ने भी मामले में दायर पुनरीक्षण को खारिज कर दिया।

मामला आगे हाईकोर्ट पहुंचा। सिंगल बेंच ने भी 20 मार्च 2024 को राजस्व अधिकारियों के आदेशों में हस्तक्षेप नहीं किया। अब डिवीजन बेंच ने भी सिंगल बेंच के आदेश को कायम रखते हुए अपील खारिज कर दी है।

आदिवासी भूमि की सुरक्षा पर हाईकोर्ट की अहम टिप्पणी

इस फैसले में हाईकोर्ट ने यह महत्वपूर्ण बात स्पष्ट की कि किसी आदिवासी के नाम जमीन का रजिस्टर्ड दस्तावेज होना अपने आप में यह साबित नहीं करता कि भूमि पर वास्तविक कब्जा और उपयोग भी उसी का है।

धारा 170-बी के तहत राजस्व अधिकारियों को जमीन के वास्तविक कब्जे और उपयोग की परिस्थितियों की जांच करने का अधिकार है, ताकि आदिवासी भूमि को गैर-आदिवासियों के अवैध या अनुचित कब्जे से संरक्षण दिया जा सके।

About The Author

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *