मध्य प्रदेश के पन्ना टाइगर रिजर्व पर केन-बेतवा नदी जोड़ो परियोजना के संभावित पर्यावरणीय प्रभावों को लेकर चिंता बढ़ गई है। इस परियोजना के खिलाफ जबलपुर स्थित मध्य प्रदेश हाईकोर्ट में एक जनहित याचिका दायर की गई है। याचिका में दावा किया गया है कि परियोजना के कारण टाइगर रिजर्व का आधे से ज्यादा हिस्सा जलमग्न हो सकता है और निर्माण कार्य के लिए करीब 60 लाख पेड़ों की कटाई करनी पड़ सकती है।

मामले की गंभीरता को देखते हुए हाईकोर्ट ने केंद्र सरकार से सेंट्रल एम्पावर्ड कमेटी (CEC) की रिपोर्ट पेश करने को कहा है। अब इस रिपोर्ट और परियोजना के पर्यावरणीय प्रभावों को लेकर अदालत में आगे की सुनवाई अहम मानी जा रही है।
क्या है केन-बेतवा नदी जोड़ो परियोजना?
केन-बेतवा लिंक परियोजना का उद्देश्य मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश के सूखाग्रस्त बुंदेलखंड क्षेत्र में पानी की उपलब्धता बढ़ाना है। इसके जरिए पेयजल और सिंचाई की जरूरतों को पूरा करने की योजना है।
परियोजना के तहत केन नदी के पानी को बेतवा नदी की ओर स्थानांतरित किया जाना है। इसके लिए दौधन बांध का निर्माण प्रस्तावित है। हालांकि, परियोजना से होने वाले संभावित पर्यावरणीय नुकसान को लेकर सवाल उठाए जा रहे हैं।
पन्ना टाइगर रिजर्व के वन्यजीवों पर क्या पड़ेगा असर?
जनहित याचिका में आशंका जताई गई है कि बड़े पैमाने पर जंगल डूबने और पेड़ों की कटाई से पन्ना टाइगर रिजर्व के पारिस्थितिकी तंत्र को गंभीर नुकसान पहुंच सकता है। इससे बाघों, घड़ियालों और अन्य वन्यजीवों के प्राकृतिक आवास प्रभावित होने की चिंता भी व्यक्त की गई है।
याचिकाकर्ताओं और पर्यावरण संरक्षण से जुड़े लोगों का तर्क है कि जंगलों का बड़े पैमाने पर नुकसान जैव विविधता के लिए गंभीर चुनौती बन सकता है। हालांकि, रिजर्व के कितने हिस्से पर प्रभाव पड़ेगा और कितने पेड़ काटे जाएंगे, इन दावों का आकलन संबंधित रिपोर्टों और आधिकारिक दस्तावेजों के आधार पर किया जाना जरूरी है।
हाईकोर्ट में CEC की रिपोर्ट पर टिकी निगाहें
मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने केंद्र सरकार को सेंट्रल एम्पावर्ड कमेटी की रिपोर्ट पेश करने का निर्देश दिया है। इस रिपोर्ट से परियोजना के संभावित पर्यावरणीय प्रभावों और उनसे जुड़े सवालों पर अदालत को विचार करने में मदद मिल सकती है।
एक ओर केन-बेतवा परियोजना से बुंदेलखंड में पेयजल और सिंचाई की जरूरतें पूरी करने की उम्मीद है, तो दूसरी ओर पन्ना के जंगलों और वन्यजीवों के संरक्षण को लेकर चिंताएं सामने आई हैं। अब CEC की रिपोर्ट और हाईकोर्ट की आगे की सुनवाई से यह स्पष्ट होगा कि पर्यावरणीय पहलुओं पर अदालत क्या रुख अपनाती है।