मध्य प्रदेश के पांढुर्णा जिले में जाम नदी के तट पर सदियों पुरानी गोटमार मेले की परंपरा एक बार फिर देखने को मिलेगी। पोला पर्व के दूसरे दिन आयोजित होने वाले इस मेले में पांढुर्णा और सावरगांव के लोग परंपरा के तहत आमने-सामने होते हैं और एक-दूसरे पर पत्थर बरसाते हैं। गोफन से पत्थर चलाने की परंपरा के कारण यह आयोजन हर साल सुरक्षा और कानून-व्यवस्था के लिहाज से चुनौतीपूर्ण रहता है।

70 साल में 14 मौतें, हजारों लोग हुए घायल
गोटमार मेले की शुरुआत मां चंडिका के पूजन और दर्शन के साथ होती है। उपलब्ध जानकारी के मुताबिक, वर्ष 1955 से अब तक पत्थरबाजी की इस परंपरा के दौरान 14 लोगों की मौत हो चुकी है, जबकि बड़ी संख्या में लोग घायल हुए हैं।
प्रशासन की ओर से कई बार पत्थरों की जगह रबर बॉल से आयोजन कराने की कोशिश की गई, लेकिन पारंपरिक स्वरूप को लेकर स्थानीय लोगों के विरोध के चलते ये प्रयास सफल नहीं हो सके।
प्रेम कहानी से जुड़ी है गोटमार मेले की किवदंती
गोटमार मेले की शुरुआत को लेकर अलग-अलग मान्यताएं प्रचलित हैं। सबसे चर्चित किवदंती पांढुर्णा के एक युवक और सावरगांव की युवती की प्रेम कहानी से जुड़ी है।
स्थानीय मान्यता के अनुसार, दोनों गांवों के लोगों ने प्रेमी युगल को नदी पार करने से रोकने के लिए पत्थरबाजी की थी। इसी घटना की स्मृति में गोटमार मेले की परंपरा शुरू होने की बात कही जाती है।
हालांकि, समय के साथ इस आयोजन में गोफन और कथित तौर पर शराब के इस्तेमाल ने पत्थरबाजी को ज्यादा आक्रामक और जोखिम भरा बना दिया है।
700 जवान, ड्रोन और CCTV से होगी निगरानी
मेले को शांतिपूर्ण तरीके से संपन्न कराने के लिए प्रशासन ने तैयारियां तेज कर दी हैं। शांति समिति की बैठकों के जरिए लोगों से संयम और शांतिपूर्ण तरीके से पर्व मनाने की अपील की गई है।
सुरक्षा व्यवस्था के तहत कलेक्टर और एसपी समेत वरिष्ठ अधिकारी मौके पर मौजूद रहेंगे। करीब 700 पुलिस जवानों की तैनाती की जा रही है। इसके अलावा ड्रोन कैमरों और CCTV के जरिए मेला क्षेत्र की निगरानी की जाएगी।
किसी भी आपात स्थिति से निपटने के लिए स्वास्थ्य विभाग को भी अलर्ट मोड पर रखा गया है।
नदी किनारे जमा किए जा रहे पत्थर
प्रशासन की तैयारियों के बीच जाम नदी के दोनों किनारों पर पत्थरों का जमावड़ा भी चिंता बढ़ा रहा है। स्थानीय स्तर पर सामने आई जानकारी के मुताबिक, मेले से पहले ट्रैक्टरों के जरिए बड़ी मात्रा में पत्थर नदी किनारे लाकर जमा किए गए हैं।
ऐसे में प्रशासन के सामने सबसे बड़ी चुनौती पारंपरिक आयोजन के दौरान पत्थरबाजी को नियंत्रित करने और लोगों की सुरक्षा सुनिश्चित करने की होगी। अब देखना होगा कि सुरक्षा के पुख्ता इंतजामों के बीच इस बार गोटमार मेला कितनी शांति और सुरक्षित तरीके से संपन्न होता है।