ग्वालियर। फर्जी दिव्यांगता प्रमाण पत्र के आधार पर सरकारी शिक्षक के रूप में नियुक्त कर्मचारियों को मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की ग्वालियर खंडपीठ से बड़ा झटका लगा है। कोर्ट ने सभी अपीलों को खारिज करते हुए स्पष्ट कहा कि अदालत से राहत पाने के लिए व्यक्ति का आचरण निष्कलंक होना चाहिए और “धोखाधड़ी हर अधिकार और दावे को समाप्त कर देती है।”
मामले की सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच ने कहा कि अदालत में वही व्यक्ति राहत की मांग कर सकता है, जिसके हाथ साफ हों। न्यायालय ने फर्जी दस्तावेजों के आधार पर प्राप्त सरकारी नौकरी को किसी भी प्रकार का कानूनी संरक्षण देने से इनकार कर दिया।

सुनवाई में यह तथ्य सामने आया कि जिन दिव्यांगता प्रमाण पत्रों के आधार पर शिक्षकों की नियुक्ति की गई थी, उनका मेडिकल बोर्ड के रिकॉर्ड और फाइलिंग रजिस्टर में कोई उल्लेख नहीं मिला। कोर्ट के निर्देश पर कराए गए पुनः सत्यापन में भी संबंधित प्रमाण पत्र फर्जी पाए गए।
अदालत ने यह भी कहा कि अपीलकर्ता अपने दावों के समर्थन में कोई विश्वसनीय मेडिकल रिकॉर्ड प्रस्तुत नहीं कर सके। ऐसे में केवल तकनीकी आधार या प्रक्रिया संबंधी दलीलों के आधार पर राहत नहीं दी जा सकती।
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि जब सरकारी रिकॉर्ड स्वयं फर्जीवाड़े की पुष्टि कर रहे हों, तब केवल पर्याप्त सुनवाई का अवसर नहीं मिलने का तर्क नियुक्ति रद्द करने के आदेश को निरस्त करने के लिए पर्याप्त आधार नहीं हो सकता।
इन्हीं तथ्यों के आधार पर हाईकोर्ट ने शासन की कार्रवाई को पूरी तरह वैध ठहराते हुए फर्जी दिव्यांगता प्रमाण पत्र के आधार पर नियुक्त सभी शिक्षकों की अपीलें खारिज कर दीं।