November 7, 2026

रायपुर। छत्तीसगढ़ की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक विरासत के लिए बड़ी उपलब्धि सामने आई है। महासमुंद जिले में महानदी के तट पर स्थित प्राचीन नगरी सिरपुर को संयुक्त राष्ट्र शैक्षिक, वैज्ञानिक एवं सांस्कृतिक संगठन (UNESCO) की विश्व धरोहर की अस्थायी सूची (Tentative List) में शामिल किया गया है। इस उपलब्धि से छत्तीसगढ़ की समृद्ध पुरातात्विक विरासत को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान मिलने का रास्ता मजबूत हुआ है।

प्राचीन मंदिरों, बौद्ध विहारों, दुर्लभ मूर्तिकला और स्थापत्य कला के लिए प्रसिद्ध सिरपुर अब विश्व धरोहर का दर्जा हासिल करने की दिशा में आगे बढ़ रहा है। मुख्यमंत्री विष्णु देव साय के नेतृत्व में राज्य सरकार प्रदेश की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक धरोहरों के संरक्षण एवं संवर्धन के लिए प्रयास कर रही है। वहीं पर्यटन एवं संस्कृति मंत्री राजेश अग्रवाल के मार्गदर्शन में महत्वपूर्ण पुरातात्विक स्थलों को वैश्विक पर्यटन मानचित्र पर स्थापित करने पर जोर दिया जा रहा है।

सिरपुर का UNESCO की अस्थायी सूची में शामिल होना इसी दिशा में महत्वपूर्ण उपलब्धि माना जा रहा है। इससे भविष्य में अंतरराष्ट्रीय पर्यटकों, इतिहासकारों और शोधकर्ताओं का आकर्षण बढ़ने की उम्मीद है।

केंद्रीय मंत्री ने किया था सिरपुर का दौरा

उल्लेखनीय है कि केंद्रीय संस्कृति एवं पर्यटन मंत्री गजेन्द्र सिंह शेखावत ने 1 जनवरी 2026 को सिरपुर के ऐतिहासिक और पुरातात्विक स्थलों का निरीक्षण किया था। इस दौरान उन्होंने यहां की समृद्ध विरासत, प्राचीन स्मारकों और स्थापत्य कला की सराहना की थी। साथ ही सिरपुर के संरक्षण एवं संवर्धन और इसे UNESCO की विश्व धरोहर सूची में शामिल कराने के लिए प्राथमिकता से प्रयास करने की बात कही थी।

दक्षिण कोसल की राजधानी रहा है प्राचीन सिरपुर

प्राचीन काल में श्रीपुर के नाम से प्रसिद्ध सिरपुर पाण्डुवंशी शासकों के शासनकाल में दक्षिण कोसल की राजधानी रहा। महानदी के तट पर बसा यह नगर राजनीतिक, धार्मिक, सांस्कृतिक और व्यापारिक गतिविधियों का प्रमुख केंद्र था।

सिरपुर की प्राचीनता के प्रमाण शरभपुरीय शासकों प्रवरराज और महासुदेवराज के ताम्रपत्रों से मिलते हैं। पाण्डुवंशी शासक महाशिवगुप्त बालार्जुन के लगभग 57 वर्षों के शासनकाल में इस नगर ने सांस्कृतिक और स्थापत्य विकास की नई ऊंचाइयां हासिल कीं। इसी दौरान अनेक मंदिरों, बौद्ध विहारों, सरोवरों और उद्यानों का निर्माण हुआ।

सातवीं शताब्दी में प्रसिद्ध चीनी यात्री ह्वेनसांग ने भी सिरपुर की यात्रा की थी। उनके यात्रा विवरण में इस क्षेत्र में बौद्ध धर्म की समृद्ध परंपरा का उल्लेख मिलता है। ऐतिहासिक विवरणों के अनुसार, उस समय यहां लगभग 100 बौद्ध संघाराम और महायान परंपरा के करीब 10 हजार भिक्षु मौजूद थे।

सिरपुर की सबसे बड़ी विशेषता यहां शैव, वैष्णव, बौद्ध और जैन धर्मों की परंपराओं का सहअस्तित्व है। शैव मत के अनुयायी होने के बावजूद महाशिवगुप्त बालार्जुन ने बौद्ध विहारों को भी संरक्षण और दान दिया था। यह प्राचीन भारत की धार्मिक सहिष्णुता और सांस्कृतिक समन्वय का महत्वपूर्ण उदाहरण है।

लक्ष्मण मंदिर: ईंटों से निर्मित स्थापत्य कला का अद्भुत नमूना

सिरपुर का प्रसिद्ध लक्ष्मण मंदिर भारतीय मंदिर स्थापत्य की उत्कृष्ट उपलब्धियों में शामिल है। लगभग सातवीं शताब्दी में निर्मित यह मंदिर ईंटों से बने प्राचीन भारतीय मंदिरों के बेहतरीन उदाहरणों में से एक है।

लगभग सात फीट ऊंची पाषाण निर्मित जगती पर स्थित यह मंदिर पंचरथ शैली में निर्मित है। इसमें गर्भगृह, अंतराल और मंडप हैं। मंदिर की बाहरी दीवारों पर चैत्य गवाक्ष, गज, कीर्तिमुख, भारवाहक गण और विभिन्न अलंकरणात्मक आकृतियां उकेरी गई हैं।

मंदिर का प्रवेश द्वार विशेष रूप से आकर्षक है। इसके शीर्ष भाग में शेषशायी भगवान विष्णु की प्रतिमा और द्वार शाखाओं पर विष्णु के विभिन्न अवतारों तथा कृष्ण लीला के प्रसंगों का सुंदर अंकन मिलता है।

ऐतिहासिक अभिलेखों के अनुसार, इस मंदिर का निर्माण महाशिवगुप्त बालार्जुन की माता रानी वासटा ने अपने दिवंगत पति हर्षगुप्त की स्मृति में कराया था। रानी वासटा मगध के राजा सूर्यवर्मन की पुत्री थीं। मंदिर का निर्माणकाल लगभग 650 ईस्वी माना जाता है।

गंधेश्वर महादेव मंदिर: महानदी के तट पर आस्था का केंद्र

महानदी के पवित्र तट पर स्थित गंधेश्वर महादेव मंदिर सिरपुर की धार्मिक विरासत का महत्वपूर्ण हिस्सा है। प्राचीन काल में गंधर्वेश्वर के नाम से प्रसिद्ध यह मंदिर आज भी श्रद्धालुओं की आस्था का प्रमुख केंद्र है।

मंदिर के निर्माण में प्राचीन मंदिरों और बौद्ध विहारों से प्राप्त स्थापत्य खंडों का उपयोग किया गया है। परिसर में अनेक कलात्मक प्रतिमाएं और पुरातात्विक अवशेष मौजूद हैं, जो तत्कालीन कला, धार्मिक जीवन और स्थापत्य परंपरा की जानकारी देते हैं।

बौद्ध धर्म का प्रमुख केंद्र रहा सिरपुर

प्राचीन काल में सिरपुर महायान बौद्ध धर्म का एक महत्वपूर्ण केंद्र था। यहां हुए पुरातात्विक उत्खननों में कई बौद्ध विहारों के अवशेष मिले हैं। इन विहारों में भिक्षुओं के निवास, ध्यान, अध्ययन और अध्यापन की व्यवस्थित सुविधाएं थीं।

प्रमुख बौद्ध विहारों में आनंदप्रभु कुटी विहार और स्वास्तिक विहार विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। आनंदप्रभु कुटी विहार का निर्माण महाशिवगुप्त बालार्जुन के शासनकाल में आनंदप्रभु नामक बौद्ध भिक्षु ने कराया था।

इस विहार में भिक्षुओं के रहने के लिए 14 कक्ष थे और यह दो मंजिला संरचना थी। मुख्य कक्ष में भगवान बुद्ध की भूमिस्पर्श मुद्रा में लगभग साढ़े छह फीट ऊंची प्रतिमा स्थापित है। यहां अवलोकितेश्वर सहित अन्य बौद्ध प्रतिमाएं भी प्राप्त हुई हैं।

वहीं स्वास्तिक विहार अपनी विशिष्ट स्थापत्य योजना के लिए प्रसिद्ध है। यहां भी भगवान बुद्ध की भूमिस्पर्श मुद्रा में प्रतिमा प्राप्त हुई है।

तीवरदेव महाविहार में दिखाई देती है प्राचीन स्थापत्य कला

सिरपुर में वर्ष 2002-03 के दौरान डॉ. अरुण कुमार शर्मा के निर्देशन में किए गए उत्खनन में विशाल तीवरदेव महाविहार के अवशेष मिले थे। लगभग 902 वर्गमीटर क्षेत्र में फैला यह महाविहार दक्षिण कोसल की बौद्ध स्थापत्य विरासत का महत्वपूर्ण प्रमाण है।

लक्ष्मण मंदिर से लगभग एक किलोमीटर पूर्व कसडोल मार्ग पर स्थित इस महाविहार की विशाल संरचना, अलंकृत प्रवेश द्वार और शिल्पकला विशेष आकर्षण का केंद्र हैं।

इसके प्रवेश द्वार पर पशु आकृतियों, पंचतंत्र की कथाओं और तत्कालीन सामाजिक जीवन से जुड़े प्रसंगों का अंकन मिलता है। मगरमच्छ और वानर की प्रसिद्ध कथा सहित विभिन्न दृश्य तत्कालीन कलाकारों की कल्पनाशीलता और शिल्प कौशल को दर्शाते हैं।

महाविहार परिसर में भूमिगत पत्थर की नालियों और सुव्यवस्थित कक्षों के अवशेष भी मिले हैं, जो प्राचीन निर्माण तकनीक और नगर नियोजन की विकसित व्यवस्था को प्रदर्शित करते हैं।

सुरंग टीला और राम मंदिर भी हैं ऐतिहासिक धरोहर

सिरपुर का सुरंग टीला अपनी विशिष्ट संरचना और मंदिर स्थापत्य के लिए महत्वपूर्ण है। यहां मिले मंदिर अवशेष, सीढ़ियां और शिल्पांकन तत्कालीन धार्मिक एवं स्थापत्य परंपराओं की जानकारी देते हैं।

इसी तरह लक्ष्मण मंदिर के पूर्व दिशा में स्थित प्राचीन राम मंदिर भी ईंटों से निर्मित महत्वपूर्ण ऐतिहासिक संरचना है। वर्तमान में इसका शिखर नष्ट हो चुका है, लेकिन दीवारों के अवशेष आज भी मौजूद हैं। इसकी ताराकृति योजना और विशिष्ट निर्माण शैली इसे पुरातात्विक दृष्टि से महत्वपूर्ण बनाती है।

दो हजार से अधिक पुरावशेषों में छिपा है सिरपुर का इतिहास

सिरपुर में अलग-अलग समय पर हुए पुरातात्विक उत्खननों में दो हजार से अधिक पुरावशेष प्राप्त हुए हैं। इनमें धातु प्रतिमाएं, आभूषण निर्माण के उपकरण, लोहे के बर्तन, ताले, जंजीर, दीपक, पूजा पात्र, मिट्टी के घड़े, कांच की चूड़ियां, पकी मिट्टी की मुहरें, खिलौने और प्राचीन सिक्के शामिल हैं।

यहां से प्राप्त एक चीनी सिक्का भी ऐतिहासिक दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जाता है, जिसे चीनी सम्राट काई युवान के काल से संबंधित बताया गया है। इसके अलावा शरभपुरीय शासक प्रसन्नमात्र और कलचुरी शासक रत्नदेव के समय के सिक्के भी मिले हैं।

ये पुरावशेष सिरपुर के प्राचीन व्यापारिक, आर्थिक और सांस्कृतिक संपर्कों की महत्वपूर्ण जानकारी देते हैं।

धातु मूर्तिकला का भी प्रसिद्ध केंद्र था सिरपुर

सातवीं और आठवीं शताब्दी में सिरपुर उत्कृष्ट धातु प्रतिमाओं के निर्माण के लिए प्रसिद्ध था। वर्ष 1939 में यहां से धातु प्रतिमाओं का महत्वपूर्ण भंडार प्राप्त हुआ था।

इनमें भगवान बुद्ध, अवलोकितेश्वर, पद्मपाणि, वज्रपाणि, मंजुश्री, तारा, ऋषभनाथ और भगवान विष्णु की प्रतिमाएं प्रमुख हैं। इनकी मुखाकृति, हस्त मुद्राएं, वस्त्रों की बनावट और सूक्ष्म अलंकरण तत्कालीन कलाकारों के उच्च कोटि के शिल्प कौशल को दर्शाते हैं।

सिरपुर से प्राप्त कई धातु प्रतिमाएं रायपुर, नागपुर, नई दिल्ली और मुंबई के संग्रहालयों एवं संस्थानों में संरक्षित हैं। इन कलाकृतियों का प्रदर्शन इंग्लैंड, जर्मनी और अमेरिका जैसे देशों में भी किया जा चुका है।

पुरातात्विक संग्रहालय में सुरक्षित हैं दुर्लभ प्रतिमाएं

लक्ष्मण मंदिर परिसर में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण द्वारा स्थापित संग्रहालय सिरपुर की प्राचीन कला और संस्कृति का महत्वपूर्ण केंद्र है। यहां शैव, वैष्णव, बौद्ध और जैन परंपराओं से संबंधित दुर्लभ प्रतिमाएं और स्थापत्य खंड संरक्षित हैं।

संग्रहालय में चतुर्मुख शिवलिंग, महिषासुरमर्दिनी, नृसिंह, अंबिका, चामुंडा, विष्णु, सूर्य, मातृका, जैन तीर्थंकर और भगवान बुद्ध की प्रतिमाएं विशेष आकर्षण हैं।

इसके अलावा केशीवध का दृश्य प्रदर्शित करने वाली प्रतिमा और नायिका की कलात्मक मूर्ति भी तत्कालीन शिल्पकला की उत्कृष्टता को दर्शाती हैं।

राजमहल के अवशेषों से सामने आई प्राचीन नगरी की भव्यता

महानदी के तट के समीप वर्ष 2000-01 में डॉ. अरुण कुमार शर्मा के निर्देशन में किए गए उत्खनन के दौरान एक विशाल परिसर के अवशेष प्राप्त हुए थे, जिन्हें राजमहल के अवशेषों के रूप में पहचाना गया।

यहां भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की महत्वपूर्ण प्रतिमाएं भी मिली हैं। इन अवशेषों से प्राचीन सिरपुर की राजनीतिक, प्रशासनिक और सांस्कृतिक समृद्धि का पता चलता है।

वर्ष 2001 से 2004 के बीच हुए विभिन्न उत्खननों में भी कई मंदिरों, बौद्ध विहारों और अन्य संरचनाओं के अवशेष सामने आए थे।

UNESCO की सूची में शामिल होने से पर्यटन को मिलेगा बढ़ावा

सिरपुर को UNESCO की विश्व धरोहर की अस्थायी सूची में शामिल किए जाने से छत्तीसगढ़ में ऐतिहासिक, सांस्कृतिक, धार्मिक और पुरातात्विक पर्यटन की संभावनाएं बढ़ने की उम्मीद है।

इससे देश-विदेश के पर्यटकों, इतिहासकारों, पुरातत्वविदों, शोधकर्ताओं और बौद्ध धर्म के अनुयायियों का आकर्षण सिरपुर की ओर बढ़ सकता है। पर्यटन गतिविधियों के विस्तार से स्थानीय होटल, होमस्टे, परिवहन, हस्तशिल्प, स्थानीय व्यंजन और अन्य रोजगारमूलक क्षेत्रों को भी लाभ मिलने की संभावना है।

विशेष रूप से सिरपुर की बौद्ध विरासत अंतरराष्ट्रीय बौद्ध पर्यटन परिपथ से जुड़ने की क्षमता रखती है। यहां शैव, वैष्णव, बौद्ध और जैन परंपराओं का ऐतिहासिक संगम इसे अन्य पर्यटन स्थलों से अलग पहचान प्रदान करता है।

विश्व धरोहर का दर्जा पाने की दिशा में महत्वपूर्ण पड़ाव

गौरतलब है कि UNESCO की अस्थायी सूची में शामिल होना किसी स्थल को विश्व धरोहर का अंतिम दर्जा मिलने के बराबर नहीं है। यह नामांकन प्रक्रिया का एक महत्वपूर्ण प्रारंभिक चरण है। इसके बाद विस्तृत नामांकन दस्तावेज, संरक्षण प्रबंधन योजना और निर्धारित अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप मूल्यांकन की प्रक्रिया पूरी करनी होती है।

सिरपुर की प्राचीन स्थापत्य कला, विशाल बौद्ध विहार, दुर्लभ मूर्तियां और विभिन्न धार्मिक परंपराओं के सहअस्तित्व की विरासत इसे वैश्विक स्तर पर विशिष्ट सांस्कृतिक पहचान प्रदान करती है।

महानदी के तट पर सदियों से अपनी ऐतिहासिक विरासत को संजोए सिरपुर अब अंतरराष्ट्रीय पहचान की नई यात्रा पर आगे बढ़ रहा है। UNESCO की अस्थायी सूची में शामिल होना छत्तीसगढ़ के लिए गौरव का विषय होने के साथ-साथ इस अमूल्य धरोहर के संरक्षण और आने वाली पीढ़ियों तक इसके इतिहास को पहुंचाने की दिशा में भी महत्वपूर्ण कदम है।

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