September 13, 2026

इस समाचार का कानूनी सार यह है कि केवल अपील में बरी हो जाने से किसी सरकारी या सार्वजनिक क्षेत्र के कर्मचारी को बर्खास्तगी अवधि का पूरा वेतन स्वतः नहीं मिल जाता।

मुख्य बिंदु:

  • रमेश सिन्हा और रवीन्द्र कुमार अग्रवाल की खंडपीठ ने कहा कि ऐसे मामलों में “No Work, No Pay” (काम नहीं तो वेतन नहीं) का सिद्धांत लागू होगा।
  • मामला एक पूर्व विद्युत मंडल कर्मचारी का था, जिसे भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 के तहत दोषी ठहराए जाने के बाद सेवा से बर्खास्त कर दिया गया था।
  • बाद में हाईकोर्ट ने आपराधिक अपील में उसे बरी कर दिया और विभाग ने बर्खास्तगी का आदेश वापस ले लिया।
  • कर्मचारी ने बर्खास्तगी से लेकर सेवानिवृत्ति तक की अवधि का वेतन, भत्ते और अन्य आर्थिक लाभ मांगे।
  • अदालत ने माना कि उस अवधि में कर्मचारी ने वास्तविक रूप से सेवा नहीं दी थी, इसलिए केवल बरी होने के आधार पर उसे उस अवधि का पूरा वेतन पाने का स्वतः अधिकार नहीं बनता।
  • कोर्ट ने इस निष्कर्ष के लिए सुप्रीम कोर्ट ऑफ इंडिया के विभिन्न निर्णयों का भी संदर्भ लिया।

फैसले का व्यावहारिक अर्थ

यदि किसी कर्मचारी को आपराधिक दोषसिद्धि के कारण नियमों के तहत बर्खास्त किया जाता है और बाद में वह अपील में बरी हो जाता है, तो:

  1. बर्खास्तगी का आदेश वापस लिया जा सकता है।
  2. सेवा संबंधी कुछ लाभ (जैसे पेंशन की गणना, सेवा अवधि का समायोजन आदि) परिस्थितियों के अनुसार मिल सकते हैं।
  3. लेकिन बर्खास्तगी अवधि का पूरा वेतन और भत्ते मिलना स्वचालित अधिकार नहीं है।
  4. वेतन देने या न देने का निर्णय संबंधित सेवा नियमों, मामले के तथ्यों और सक्षम प्राधिकारी के आदेश पर निर्भर करेगा।

इस फैसले से अदालत ने स्पष्ट किया कि बरी होना और बर्खास्तगी अवधि का वेतन मिलना दो अलग-अलग कानूनी प्रश्न हैं। केवल बरी होने से पिछला वेतन पाने का अधिकार स्वतः उत्पन्न नहीं होता।

About The Author

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *