बिलासपुर। बिलासपुर हाईकोर्ट ने घरेलू हिंसा अधिनियम से जुड़े एक मामले में अहम टिप्पणी की है। कोर्ट ने कहा कि यदि किसी महिला को पहले से पता है कि पुरुष शादीशुदा है और उसकी पत्नी जीवित है, इसके बावजूद वह उसके साथ संबंध में रहती है, तो परिस्थितियों के आधार पर ऐसे रिश्ते को ‘विवाह की प्रकृति वाला संबंध’ (Relationship in the nature of marriage) नहीं माना जा सकता।
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि ऐसी स्थिति में घरेलू हिंसा से महिलाओं का संरक्षण अधिनियम, 2005 के तहत राहत पाने के लिए जरूरी ‘डोमेस्टिक रिलेशनशिप’ की बुनियादी शर्त पूरी नहीं होती। मामले की सुनवाई जस्टिस नरेश कुमार चंद्रवंशी की सिंगल बेंच ने की।
क्या है पूरा मामला?
सूरजपुर निवासी महिला ने हाईकोर्ट में क्रिमिनल रिवीजन याचिका दायर की थी। महिला का कहना था कि उसने उग्रनारायण सिंह के साथ मंदिर में शादी की थी। इसके बाद दोनों लिव-इन रिलेशनशिप में साथ रहे।
महिला ने तर्क दिया कि दोनों के साथ रहने के कारण उनका संबंध घरेलू हिंसा से महिलाओं का संरक्षण अधिनियम, 2005 की धारा 2(एफ) के तहत ‘डोमेस्टिक रिलेशनशिप’ की श्रेणी में आता है। इसी आधार पर उसने घरेलू हिंसा अधिनियम की धारा 12 के तहत राहत की मांग की थी।
पुरुष ने पहली शादी का दिया हवाला
याचिका का विरोध करते हुए उग्रनारायण सिंह की ओर से बताया गया कि उसकी शादी वर्ष 2000 में अनंत कुमारी से हो चुकी थी और इस विवाह से उसके दो बच्चे हैं।
उसका कहना था कि महिला को उसकी पहली शादी और बच्चों के बारे में पहले से जानकारी थी। पहली शादी के रहते दूसरी शादी कानूनी रूप से मान्य नहीं है। इसके अलावा दोनों के बीच पारिवारिक रिश्ता भी है, जिसके कारण उनका संबंध हिंदू विवाह अधिनियम के तहत प्रतिबंधित रिश्ते की श्रेणी में आता है।
मजिस्ट्रेट से लेकर हाईकोर्ट तक पहुंचा मामला
महिला ने घरेलू हिंसा अधिनियम की धारा 12 के तहत न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी, सूरजपुर के समक्ष आवेदन पेश किया था। मजिस्ट्रेट ने 30 मार्च 2024 को आवेदन खारिज कर दिया।
इसके बाद महिला ने इस आदेश के खिलाफ अपील की। द्वितीय अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश, सूरजपुर ने 8 दिसंबर 2025 को निचली अदालत के फैसले को बरकरार रखा।
इसके बाद महिला ने हाईकोर्ट में क्रिमिनल रिवीजन याचिका दायर की।
ममेरे रिश्ते को लेकर भी कोर्ट ने की टिप्पणी
हाईकोर्ट ने याचिका खारिज करते हुए यह भी पाया कि महिला और पुरुष ममेरे रिश्ते में थे। कोर्ट ने कहा कि ऐसे रिश्ते में भाई-बहन के बच्चों के बीच विवाह प्रतिबंधित रिश्ते की श्रेणी में आता है।
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि ऐसा विवाह तभी वैध हो सकता है, जब दोनों पक्षों पर लागू कोई मान्य प्रथा या रूढ़ि इस तरह के विवाह की अनुमति देती हो। इस मामले में ऐसी किसी प्रथा या रूढ़ि को साबित नहीं किया गया।
हाईकोर्ट ने निचली अदालतों के फैसले को माना सही
सभी परिस्थितियों पर विचार करने के बाद हाईकोर्ट ने महिला की याचिका खारिज कर दी और निचली अदालतों के फैसले को सही ठहराया।
कोर्ट की टिप्पणी का मूल आधार यह रहा कि महिला को पुरुष की पहली शादी के बारे में जानकारी थी और मौजूदा परिस्थितियों में उनके संबंध को घरेलू हिंसा अधिनियम की धारा 2(एफ) के तहत विवाह की प्रकृति वाला संबंध नहीं माना जा सकता।