कि मांझियों ने उन्हें मुरिया दरबार की व्यवस्था के बारे में विस्तार से समझाया। यह व्यवस्था जमीन से जुड़ी हुई है और खुशहाली का रास्ता दिखाती है। इससे लोकतंत्र मजबूत होता है। राष्ट्रपति ने कहा कि प्रतिनिधिमंडल से मुलाकात के दौरान उन्हें बस्तर पंडुम में शामिल होने का निमंत्रण भी मिला था।

नक्सलवाद से मुक्ति के बाद बस्तर में विकास की नई राह
राष्ट्रपति ने कहा कि छत्तीसगढ़ लंबे समय तक नक्सलवाद से प्रभावित रहा, लेकिन केंद्र और राज्य सरकारों के प्रयासों से नक्सली हिंसा से पीड़ित लोग अब मुक्त होकर आगे बढ़ रहे हैं। इससे देश के दूरस्थ क्षेत्रों में रहने वाले लोगों को भी नई ऊर्जा मिली है।
उन्होंने बस्तर ओलंपिक का उल्लेख करते हुए कहा कि इसमें आदिवासी समाज के लोगों ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया। यहां के खिलाड़ी आगे चलकर ओलंपिक में पदक जीत सकते हैं।
दंडकारण्य की पवित्रता और प्राकृतिक धरोहर बचाना सबका कर्तव्य
राष्ट्रपति मुर्मू ने बस्तर के ऐतिहासिक और धार्मिक महत्व का उल्लेख करते हुए कहा कि इस क्षेत्र को दंडकारण्य कहा जाता है, जिसका जिक्र वाल्मीकि रामायण में भी मिलता है। भगवान राम ने वनवास के दौरान इस क्षेत्र में समय बिताया था। उन्होंने कहा कि यह पवित्र भूमि है और इसकी पवित्रता बनाए रखना सभी का कर्तव्य है।
उन्होंने कहा कि आज भी जनजातीय समाज में भगवान राम, लक्ष्मण और माता सीता से जुड़ी परंपराओं और प्रसंगों का उल्लेख होता है। दंडकारण्य क्षेत्र का संबंध माता सीता के हरण, रावण के संहार और भगवान राम की माता शबरी से भेंट जैसे प्रसंगों से भी जोड़ा जाता है।
राष्ट्रपति ने कहा कि छत्तीसगढ़ में विकास के कई नए रास्ते खुल रहे हैं। नक्सली हिंसा का प्रभाव कम होने के साथ वित्तीय सुविधाओं और बाजार से जुड़ने की पहल भी तेज हुई है। यहां का समाज आगे विकास करने की पर्याप्त क्षमता रखता है।
उन्होंने आदिवासी समाज की प्रकृति-पूजा की परंपरा का उल्लेख करते हुए कहा कि यहां पेड़-पौधों, पत्थरों और मिट्टी की पूजा की जाती है। पेड़-पौधे जीवनदाता हैं। जल, वायु, भोजन और जीवन के लिए जरूरी अनेक चीजें प्रकृति से मिलती हैं। जंगल और पहाड़ कुदरत की देन हैं। इन्हें सुरक्षित रखना और प्राकृतिक धरोहर को बचाए रखना हर व्यक्ति का कर्तव्य है।