November 6, 2026

ग्वालियर। ऐतिहासिक महाराज बाड़े के गोरखी परिसर स्थित देवघर में केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया ने सूफी संत मंसूर शाह से जुड़ी परंपरा के तहत पूजा-अर्चना कर आशीर्वाद लिया। सिंधिया राजपरिवार में चली आ रही यह परंपरा करीब 300 साल पुराने इतिहास से जुड़ी मानी जाती है। इसके पीछे पानीपत के युद्ध, संत के आशीर्वाद और आधी रोटी से जुड़ी एक कहानी प्रचलित है, जिसे राजपरिवार आज भी श्रद्धा के साथ संजोए हुए है।

महादजी सिंधिया के समय से चली आ रही परंपरा

ग्वालियर के महाराज बाड़े स्थित गोरखी परिसर के देवघर में ज्योतिरादित्य सिंधिया ने मंसूर शाह की स्मृति से जुड़ी परंपरा के तहत पूजा की। सिंधिया राजपरिवार के मुखिया विशेष अवसरों पर यहां पहुंचकर इस परंपरा का निर्वहन करते हैं।

ज्योतिरादित्य सिंधिया ने पूजा के बाद मंसूर शाह का आशीर्वाद लेने की बात कही। देवघर में हिंदू देवी-देवताओं के साथ सूफी संत मंसूर शाह से जुड़ी स्मृतियां और वस्तुएं भी सुरक्षित रखी गई हैं।

पानीपत के युद्ध से जुड़ी है मंसूर शाह के आशीर्वाद की कहानी

सिंधिया राजपरिवार में प्रचलित मान्यता के अनुसार, पानीपत के युद्ध में गंभीर रूप से घायल होने के बाद महादजी सिंधिया के परिवार को उनकी सलामती की चिंता सता रही थी। इसी दौरान महादजी की मां और पत्नी सूफी संत मंसूर शाह के पास पहुंचीं।

कहानी के मुताबिक, संत ने उन्हें महादजी के जीवित होने और वापस लौटने का भरोसा दिलाया। कुछ समय बाद महादजी के घायल अवस्था में जीवित लौटने पर परिवार ने इसे संत के आशीर्वाद से जोड़कर देखा।

आधी रोटी और पांच पीढ़ियों तक राज करने का आशीर्वाद

राजपरिवार में प्रचलित कथा के अनुसार, मंसूर शाह ने महादजी सिंधिया को आधी रोटी दी और पांच पीढ़ियों तक राज करने का आशीर्वाद दिया था। इस आधी रोटी को सिंधिया परिवार ने एक महत्वपूर्ण धरोहर के रूप में संभालकर रखा है।

मान्यता के अनुसार, देवघर में आज भी आधी रोटी के अवशेष और संत से जुड़ी अन्य वस्तुओं की पूजा की जाती है। यही वजह है कि यह परंपरा सिंधिया राजवंश के इतिहास और आस्था से जुड़ा विशेष स्थान रखती है।

देवघर में हिंदू देवी-देवताओं के साथ सूफी संत की स्मृतियां

ग्वालियर के गोरखी परिसर स्थित देवघर में हिंदू देवी-देवताओं के साथ मंसूर शाह से जुड़ी स्मृतियां भी रखी गई हैं। परंपरा के अनुसार, राजपरिवार का मुखिया विशेष अवसरों पर यहां पूजा-अर्चना करता है।

श्राद्ध पक्ष के दौरान होने वाली पूजा की एक खास परंपरा भी बताई जाती है। इसमें फूलों से सजाए गए शिवलिंग के प्रतीकात्मक स्वरूप पर सिंधिया राजपरिवार की शाही पगड़ी रखी जाती है और नीचे चादर बिछाई जाती है। मान्यता है कि जब फूल चादर पर गिरता है, तभी पूजा संपन्न मानी जाती है। इसके लिए कई बार घंटों इंतजार करना पड़ता है।

सिंधिया राजवंश की विरासत और हिंदू-मुस्लिम एकता का प्रतीक

महादजी सिंधिया के समय से चली आ रही यह परंपरा आज भी ग्वालियर की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक विरासत का हिस्सा है। आधी रोटी और आशीर्वाद से जुड़ी कथा सिंधिया राजपरिवार और सूफी संत मंसूर शाह के बीच पीढ़ियों से चले आ रहे संबंधों की याद दिलाती है।

यह परंपरा धार्मिक आस्था के साथ-साथ हिंदू और मुस्लिम सांस्कृतिक परंपराओं के मेल का भी उदाहरण मानी जाती है।

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