September 14, 2026

रायपुर। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और महाराष्ट्र प्रदेश कांग्रेस कमेटी के पूर्व अध्यक्ष नाना भाऊ पटोले ने जातिगत जनगणना के मौजूदा प्रारूप को दोषपूर्ण बताते हुए केंद्र सरकार पर निशाना साधा है। उन्होंने आरोप लगाया कि जातिगत जनगणना को लेकर मोदी सरकार की नीयत साफ नहीं है। पटोले ने मौजूदा प्रश्नावली को रद्द कर नई प्रश्नावली तैयार करने की मांग की है।

छत्तीसगढ़ कांग्रेस अध्यक्ष दीपक बैज और नेता प्रतिपक्ष डॉ. चरणदास महंत की मौजूदगी में पत्रकार वार्ता को संबोधित करते हुए पटोले ने कहा कि तेलंगाना और बिहार में अपनाई गई पद्धति के आधार पर जातियों की प्रमाणित सूची यानी ड्रॉपडाउन लिस्ट तैयार कर देशभर में पारदर्शी तरीके से जातिगत जनगणना कराई जानी चाहिए।

सवाल नंबर 10 पर पटोले ने जताई आपत्ति

नाना पटोले ने कहा कि आगामी जनगणना के लिए अधिसूचित 40 सवालों में से सवाल नंबर 10 ही मौजूदा व्यवस्था को लेकर चिंता पैदा करता है। उनके मुताबिक इस सवाल में ओपन-एंडेड विकल्प रखा गया है, जबकि जातिगत जनगणना के लिए ड्रॉपडाउन सूची का इस्तेमाल किया जाना चाहिए।

उन्होंने समझाया कि ड्रॉपडाउन व्यवस्था में सरकार द्वारा मान्य जातियों की एक प्रमाणित सूची पहले से उपलब्ध होती है। गणनाकार नागरिक से उसकी जाति पूछकर सूची में मौजूद संबंधित विकल्प का चयन करता है।

इसके विपरीत ओपन-एंडेड व्यवस्था में कोई पूर्व निर्धारित सूची नहीं होती। इसमें नागरिक अपनी जाति या उपजाति का जो नाम बताएगा, गणनाकार उसे उसी रूप में दर्ज करेगा।

एक जाति के कई नाम दर्ज होने का जताया खतरा

पटोले का कहना है कि ओपन-एंडेड प्रारूप में देशभर में जातियों की सही गिनती करना मुश्किल हो सकता है। भारत में एक ही जाति अलग-अलग राज्यों और क्षेत्रों में अलग-अलग नामों, उपजातियों, भाषाओं और स्थानीय बोलियों के नाम से जानी जाती है।

उनके मुताबिक घर-घर जाकर गणना के दौरान क्षेत्रीय बोलियों, पर्यायवाची नामों और वर्तनी के अंतर के कारण एक ही जाति के कई अलग-अलग नाम दर्ज हो सकते हैं। इससे आंकड़ों में विसंगतियां पैदा होने और जातिगत जनगणना से मिलने वाले डेटा की उपयोगिता प्रभावित होने की आशंका है।

‘ओबीसी की सही संख्या सामने नहीं आएगी’

कांग्रेस नेता ने दावा किया कि मौजूदा प्रारूप से देश में ओबीसी आबादी का सही आंकड़ा सामने नहीं आ पाएगा। उन्होंने कहा कि प्रश्नावली में पिछड़ा वर्ग शब्द तक शामिल नहीं है।

पटोले ने मांग की कि नई प्रश्नावली तैयार करने से पहले राजनीतिक दलों, विशेषज्ञों और आम जनता से व्यापक विचार-विमर्श किया जाए। उनका कहना है कि प्रमाणित जातियों की सूची के आधार पर तैयार की गई प्रश्नावली से प्रत्येक जाति और समुदाय की संख्या का अधिक सटीक आंकड़ा सामने आ सकेगा।

‘सामाजिक न्याय के लिए उपयोगी हो जातिगत जनगणना’

नाना पटोले ने कहा कि जातिगत जनगणना सिर्फ आंकड़े जुटाने की प्रक्रिया नहीं होनी चाहिए, बल्कि इससे प्राप्त आंकड़े सामाजिक न्याय और नीतिगत फैसलों के लिए उपयोगी भी होने चाहिए।

उन्होंने मौजूदा प्रश्नावली को खारिज करने और ड्रॉपडाउन सूची के आधार पर नई प्रश्नावली तैयार करने की मांग दोहराई। साथ ही कहा कि पूरी प्रक्रिया पारदर्शी तरीके से कराई जानी चाहिए, ताकि देश में विभिन्न जातियों और समुदायों की वास्तविक संख्या का विश्वसनीय आंकड़ा सामने आ सके।

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