है। मंदिर के शिखर से लेकर परिसर में स्थित उप-मंदिरों के जीर्णोद्धार पर 10.27 करोड़ रुपये खर्च किए जाएंगे। खास बात यह है कि प्राचीन और मूल संरचना को सुरक्षित रखने के लिए मरम्मत में सीमेंट और सरिए का उपयोग नहीं होगा। इसके बजाय पारंपरिक पद्धति से चूना, गुड़ और लाख के मिश्रण का इस्तेमाल किया जाएगा।

CBRI के मार्गदर्शन में UDA करा रहा जीर्णोद्धार
केंद्रीय भवन शोध संस्थान (CBRI) के तकनीकी मार्गदर्शन में उज्जैन विकास प्राधिकरण (UDA) द्वारा यह कार्य कराया जा रहा है। महाकाल मंदिर के शिखर पर मरम्मत के लिए मचान भी तैयार कर दिया गया है।
महाकाल मंदिर प्रबंध समिति के अनुसार, पूरे जीर्णोद्धार कार्य को आगामी महाशिवरात्रि से पहले पूरा करने का लक्ष्य रखा गया है। CBRI की विशेषज्ञ टीम हर महीने दो बार उज्जैन पहुंचकर कार्य की निगरानी करेगी।
परिसर के इन प्राचीन मंदिरों का होगा जीर्णोद्धार
इस परियोजना के तहत महाकाल मंदिर परिसर में स्थित कई ऐतिहासिक और धार्मिक महत्व के मंदिरों के साथ कोटि तीर्थ कुंड का भी संरक्षण किया जाएगा। इनमें शामिल हैं:
- नागचंद्रेश्वर मंदिर
- वृद्धकालेश्वर मंदिर
- अनादि कल्पेश्वर मंदिर
- ओंकारेश्वर मंदिर
- कालेश्वर मंदिर
- चिंतामणि गणेश मंदिर
- मनकामेश्वर मंदिर
- सिद्धेश्वर महादेव मंदिर
- गोवर्धन मंदिर
- केदारेश्वर मंदिर
- भीमाशंकर मंदिर
- पाताल महादेव मंदिर
- त्र्यंबकेश्वर मंदिर
- कोटि तीर्थ कुंड
मूल प्राचीन स्वरूप को सुरक्षित रखना प्राथमिकता
उज्जैन विकास प्राधिकरण के सहायक यंत्री शैलेन्द्र जैन के मुताबिक, जीर्णोद्धार का मुख्य उद्देश्य मंदिरों की संरचनात्मक मजबूती, सुरक्षा और लंबे समय तक संरक्षण सुनिश्चित करना है। काम के दौरान विशेष ध्यान रखा जा रहा है कि मंदिरों की मूल प्राचीन संरचना को कोई नुकसान न पहुंचे।
शिखर से लेकर भू-तल तक जहां दरारें आई हैं, जालियां टूटी हैं, खंभे क्षतिग्रस्त हुए हैं या पानी रिसने की समस्या है, वहां पारंपरिक विधि से मरम्मत की जाएगी। इसके लिए चूना, गुड़ और लाख के मिश्रण का उपयोग होगा।
अधिकारियों के अनुसार, मंदिरों का जो प्राचीन स्वरूप है, उसे उसी रूप में सहेजने की कोशिश की जा रही है, ताकि ऐतिहासिक और धार्मिक विरासत सुरक्षित रह सके।