उज्जैन। सनातन धर्म के त्योहारों और पारंपरिक पूजा पद्धतियों के स्वरूप में हो रहे बदलावों को लेकर अखिल भारतीय पुजारी महासंघ ने चिंता जताई है। महासंघ ने दो वरिष्ठ धर्माचार्यों पंडित धीरेंद्र शास्त्री और अवधेशानंद गिरी महाराज को पत्र लिखकर विभिन्न धार्मिक परंपराओं पर शास्त्रीय समाधान मांगा है।

महाकाल मंदिर के पुजारी और महासंघ के संस्थापक एवं राष्ट्रीय अध्यक्ष पं. महेश पुजारी की ओर से जारी पत्र में त्योहारों के आयोजन, संतों की भूमिका और धार्मिक परंपराओं से जुड़े कई सवाल उठाए गए हैं।
संतों से पूछा- सनातन परंपराओं को लेकर क्यों नहीं हो रही स्पष्ट पहल?
पत्र में दोनों धर्माचार्यों को सनातन धर्म का रक्षक बताते हुए कहा गया है कि उनके रहते भी परंपराओं को तोड़ने और धर्म को नुकसान पहुंचाने के प्रयास हो रहे हैं। पत्र में सवाल किया गया है कि देश में हजारों महामंडलेश्वर और आचार्य होने के बावजूद इस तरह की गतिविधियां लगातार क्यों जारी हैं।
महेश पुजारी ने सिंहस्थ का जिक्र करते हुए आरोप लगाया कि आयोजन नजदीक आते ही कुछ संत अपने मठों और आश्रमों के लिए सरकार से आर्थिक सहायता मांगने लगते हैं। उन्होंने सवाल किया कि संतों के लिए भिक्षा वृत्ति उचित मानी जाती है, लेकिन सरकार से आर्थिक सहायता मांगना कितना सही है और इस पर धर्माचार्य क्या कदम उठाएंगे?
संतों के धन संग्रह और सरकारी जमीन पर अतिक्रमण का मुद्दा उठाया
पत्र में जैन समाज के साधु-संतों का उदाहरण देते हुए कहा गया है कि वे साधु बनने के बाद धन संग्रह नहीं करते, जबकि सनातन धर्म के कुछ संतों पर धन संग्रह कर व्यापार और लॉज चलाने के आरोप लगाए गए हैं। साथ ही सरकारी जमीनों पर अतिक्रमण का मुद्दा भी उठाया गया है।
महासंघ ने सवाल किया है कि क्या इस तरह की गतिविधियां सनातन संतों के आदर्शों के अनुरूप हैं या इन्हें अवगुण माना जाना चाहिए?
गणेश उत्सव, गरबा और रावण दहन पर मांगा शास्त्रीय प्रमाण
महासंघ ने पत्र में धार्मिक आयोजनों की अवधि और उनके शास्त्रीय आधार को लेकर भी सवाल पूछे हैं। इसमें प्रमुख रूप से तीन विषय उठाए गए हैं:
- गणेश उत्सव: परंपरागत रूप से गणेश उत्सव कितने दिनों का होना चाहिए? स्थापना से विसर्जन तक की अवधि का शास्त्रीय प्रमाण क्या है?
- गरबा और नवरात्रि: दुर्गा नवरात्रि में गरबा खेलने की परंपरा कितने दिनों तक मनाई जानी चाहिए? इसका शास्त्रीय आधार क्या है?
- रावण दहन: रावण का वध किस महीने और किस तिथि को हुआ था? रावण दहन की परंपरा का शास्त्रीय आधार क्या है और इसका उल्लेख किस शास्त्र में मिलता है?
महासंघ का कहना है कि त्योहारों और पूजा पद्धतियों में बदलाव के दौरान शास्त्रीय प्रमाणों का ध्यान रखा जाना चाहिए, ताकि परंपराओं को ठेस न पहुंचे।
रावण दहन पर दुर्योधन और दुशासन का भी किया जिक्र
पत्र में रावण दहन की परंपरा पर सवाल उठाते हुए महेश पुजारी ने लिखा है कि यदि रावण दहन का आधार सीता हरण है, तो दुर्योधन और दुशासन ने भी गंभीर कृत्य किए थे। ऐसे में उन्होंने सवाल किया कि रावण अधिक व्यभिचारी था या दुर्योधन और दुशासन?
पत्र में आग्रह किया गया है कि सनातन धर्म के त्योहारों और परंपराओं को लेकर हो रहे कथित मजाक या बदलावों पर धर्माचार्य खुलकर अपना मत रखें।
उज्जैन के संतों से जवाब नहीं मिलने का भी उल्लेख
पत्र के अंत में हस्तलिखित टिप्पणी भी जोड़ी गई है। इसमें कहा गया है कि उज्जैन के संत, महंत और महामंडलेश्वर रावण दहन के विषय में सवालों के जवाब नहीं दे सके। टिप्पणी में सवाल उठाया गया है कि क्या उन्हें शास्त्रों का ज्ञान नहीं है?
महासंघ ने दोनों धर्माचार्यों से आग्रह किया है कि वे उठाए गए सभी विषयों पर अपना शास्त्रीय मत संस्था को उपलब्ध कराएं, ताकि सनातन धर्म के अनुयायियों को सही जानकारी दी जा सके।