बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा है कि यदि कोई कर्मचारी छत्तीसगढ़ सिविल सर्विसेज (लीव) रूल्स की शर्तें पूरी करता है, तो केवल स्टाफ की कमी या प्रशासनिक आवश्यकताओं के आधार पर उसे चाइल्ड केयर लीव से वंचित नहीं किया जा सकता। अदालत ने स्पष्ट किया कि इस अवकाश का उद्देश्य बच्चे के शुरुआती वर्षों में उसकी उचित देखभाल और परवरिश सुनिश्चित करना है। जस्टिस विभु दत्त गुरु की एकलपीठ ने महिला वार्डर को चाइल्ड केयर लीव देने के निर्देश दिए हैं।
याचिकाकर्ता मंदा तिवारी केंद्रीय जेल, बिलासपुर में जेल वार्डर के पद पर कार्यरत हैं। 10 सितंबर 2025 को उन्होंने जुड़वां बच्चों को जन्म दिया था। उन्हें 13 मई 2026 से 11 जुलाई 2026 तक चाइल्ड केयर लीव प्रदान की गई थी। इसके बाद बच्चों की कम उम्र और निरंतर मातृ देखभाल की आवश्यकता का हवाला देते हुए उन्होंने 60 दिन के अतिरिक्त अवकाश के लिए आवेदन किया।

हालांकि, जेल प्रशासन ने स्टाफ की कमी, महिला वार्डरों की सीमित उपलब्धता और सुरक्षा संबंधी आवश्यकताओं का हवाला देते हुए उनका आवेदन अस्वीकार कर दिया।
इस निर्णय को चुनौती देते हुए दायर याचिका पर सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने जेल अधीक्षक से शपथपत्र के माध्यम से जवाब मांगा। जवाब मिलने के बाद अदालत ने कहा कि स्टाफ की कमी या प्रशासनिक कठिनाइयों को किसी कर्मचारी के वैधानिक अधिकार से इनकार करने का आधार नहीं बनाया जा सकता। अदालत ने कहा कि सेवा संबंधी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए उचित प्रशासनिक व्यवस्था करना नियोक्ता की जिम्मेदारी है और प्रशासनिक बाधाएं कानूनी अधिकारों पर हावी नहीं हो सकतीं।
हाईकोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि चाइल्ड केयर लीव के उद्देश्य, याचिकाकर्ता के जुड़वां बच्चों की कम उम्र और इस तथ्य को देखते हुए कि वह अब भी इस सुविधा के लिए पात्र हैं, केवल स्टाफ की कमी के आधार पर उनका आवेदन खारिज करना मनमाना और अनुचित है।
सुनवाई के दौरान जेल अधीक्षक ने शपथपत्र में बताया कि केंद्रीय जेल, बिलासपुर में वार्डर के 106 स्वीकृत पद हैं, जिनमें 82 पद भरे हुए हैं, जबकि 24 पद रिक्त हैं। इसके अलावा जेल में केवल 13 महिला वार्डर पदस्थ हैं। प्रशासन ने इसी कमी और सुरक्षा संबंधी जरूरतों का हवाला देते हुए अतिरिक्त चाइल्ड केयर लीव देने से इनकार किया था।