November 4, 2026

रायपुर। छत्तीसगढ़ में माताओं और नवजात बच्चों की मृत्यु के मामलों को कम करने के लिए स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत करने की दिशा में पहल शुरू की गई है। स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण विभाग ने इसके लिए ‘सुमन (सुरक्षित मातृत्व आश्वासन) रोडमैप 2030’ पर काम शुरू किया है। रायपुर में आयोजित राज्य स्तरीय कार्यशाला में सुरक्षित प्रसव, गर्भवती महिलाओं की नियमित जांच और आपात स्थिति में समय पर उपचार उपलब्ध कराने की व्यवस्था बेहतर बनाने पर चर्चा हुई। खास तौर पर प्रदेश के 12 प्राथमिकता वाले जिलों में स्वास्थ्य सुविधाओं को मजबूत करने पर जोर दिया गया।

स्वास्थ्य विभाग ने यह कार्यशाला अंतरराष्ट्रीय संस्था JHPIEGO के तकनीकी सहयोग से आयोजित की। इसका उद्देश्य वर्ष 2030 तक मातृ एवं नवजात मृत्यु दर कम करने के लिए ऐसी कार्ययोजना तैयार करना है, जिसे जिलों की स्थानीय जरूरतों के अनुसार लागू किया जा सके।

इन 12 जिलों में स्वास्थ्य सुविधाओं को मजबूत करने पर जोर

कार्यशाला में प्रदेश के 12 जिलों को प्राथमिकता वाले जिलों के रूप में शामिल किया गया है। इनमें शामिल हैं:

  • बेमेतरा
  • बीजापुर
  • धमतरी
  • दंतेवाड़ा
  • कांकेर
  • खैरागढ़-छुईखदान-गंडई (केसीजी)
  • कोंडागांव
  • महासमुंद
  • मोहला-मानपुर-अंबागढ़ चौकी
  • नारायणपुर
  • राजनांदगांव
  • सरगुजा

इन जिलों की प्रथम संदर्भन इकाइयों (FRU), जिला अस्पतालों (DH) और सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों (CHC) में स्वास्थ्य सुविधाएं बेहतर बनाने पर जोर दिया गया। इसके लिए जिला स्तर पर अलग-अलग कार्ययोजनाएं तैयार करने की रणनीति पर चर्चा हुई, ताकि स्थानीय जरूरतों के अनुरूप स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार किया जा सके।

गर्भावस्था से प्रसव के बाद तक मिलेगी बेहतर देखभाल

सुमन रोडमैप 2030 के तहत गर्भवती महिलाओं को प्रसव से पहले, प्रसव के दौरान और प्रसव के बाद बेहतर स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध कराने पर ध्यान दिया जाएगा।

इसमें मुख्य रूप से शामिल हैं:

  • प्रसव पूर्व जांच (ANC): गर्भवती महिलाओं की नियमित स्वास्थ्य जांच और जोखिम की समय पर पहचान।
  • सुरक्षित संस्थागत प्रसव: अस्पतालों में सुरक्षित प्रसव की सुविधाओं को बेहतर बनाना।
  • प्रसव के बाद देखभाल (PNC): मां और नवजात की नियमित निगरानी और आवश्यक उपचार।
  • आपातकालीन उपचार: जटिल प्रसव और अन्य गंभीर स्थितियों में समय पर इलाज की व्यवस्था।
  • प्रथम संदर्भन इकाइयों को मजबूत करना: जरूरत के समय आवश्यक चिकित्सा सुविधाएं और उपचार उपलब्ध कराना।

इन व्यवस्थाओं को बेहतर बनाने से गर्भावस्था और प्रसव के दौरान होने वाली जटिलताओं की समय पर पहचान और उपचार में मदद मिल सकती है।

जिला स्तर पर जवाबदेही और समन्वय पर भी जोर

कार्यशाला में स्वास्थ्य सेवाओं को प्रभावी बनाने के लिए जिला स्तर पर अधिकारियों की जवाबदेही तय करने और विभिन्न विभागों के बीच समन्वय मजबूत करने पर भी चर्चा हुई।

तकनीकी विशेषज्ञों और सामुदायिक स्तर पर काम करने वाली संस्थाओं के अनुभवों को साझा किया गया। साथ ही, जिला कार्ययोजनाओं को स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप तैयार करने पर जोर दिया गया, ताकि स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार के प्रयासों का लाभ जरूरतमंद महिलाओं और नवजात बच्चों तक पहुंच सके।

मेडिकल कॉलेजों और अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं ने लिया हिस्सा

कार्यशाला में स्वास्थ्य सेवाएं आयुक्त-सह-संचालक और राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन (NHM) के मिशन संचालक संजीव कुमार झा के निर्देशन में कार्यवाही आगे बढ़ाई गई। मातृ स्वास्थ्य की संयुक्त संचालक डॉ. निर्मला यादव और उपसंचालक डॉ. स्मृति देवांगन ने भी कार्यशाला का नेतृत्व किया।

इसमें एम्स रायपुर के स्त्री एवं प्रसूति रोग विभागाध्यक्ष, प्रदेश के 10 शासकीय और 5 निजी मेडिकल कॉलेजों के संबंधित विभागाध्यक्ष, सभी जिलों के मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी (CMHO), जिला RCH नोडल अधिकारी, ब्लॉक नोडल अधिकारी और FOGSI के प्रतिनिधि शामिल हुए।

इसके अलावा WHO, UNICEF, JHPIEGO, Nutrition International, KPMG, IPAS, Piramal Foundation, Wadhwani AI, Azim Premji Foundation, ARMANN और YosAid जैसी संस्थाओं के राज्य प्रमुखों ने भी भाग लिया।

कार्यशाला में शामिल प्रतिनिधियों ने वर्ष 2030 तक मातृ एवं नवजात मृत्यु दर कम करने के लक्ष्य को हासिल करने के लिए समन्वित प्रयासों और स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार की जरूरत पर जोर दिया।

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