November 5, 2026

बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि पत्नी द्वारा घरेलू हिंसा, दहेज प्रताड़ना या धारा 498-A के तहत आपराधिक मामला दर्ज कराना मात्र पति के प्रति क्रूरता नहीं माना जा सकता। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि जब तक यह साबित न हो कि पत्नी की ओर से शुरू की गई आपराधिक कार्यवाही पूरी तरह झूठी, दुर्भावनापूर्ण या मनगढ़ंत थी, तब तक केवल कानूनी कार्रवाई को तलाक का आधार नहीं बनाया जा सकता।

डिवीजन बेंच ने महासमुंद फैमिली कोर्ट के तलाक के आदेश को रद्द करते हुए पत्नी की अपील स्वीकार कर ली। मामला महासमुंद निवासी जसमीत सिंह मक्कड़ और रज्जी कौर के वैवाहिक विवाद से जुड़ा है। दोनों का विवाह 10 दिसंबर 2011 को सिख रीति-रिवाज से हुआ था और उनका एक बेटा है।

पति ने लगाए थे ये आरोप

पति ने वर्ष 2021 में महासमुंद फैमिली कोर्ट में सिविल सूट दाखिल कर आरोप लगाया था कि पत्नी छोटी-छोटी बातों को लेकर विवाद करती है, ससुराल वालों का सम्मान नहीं करती और बिना उचित कारण मायके चली जाती है। उसने यह भी आरोप लगाया कि पत्नी उस पर अलग रहने का दबाव बनाती थी।

पति की ओर से 498-A के मामले को भी मानसिक प्रताड़ना बताते हुए तलाक की मांग की गई थी। फैमिली कोर्ट ने 7 नवंबर 2023 को पति के पक्ष में तलाक की डिक्री पारित कर दी थी।

पत्नी ने हाईकोर्ट में क्या कहा?

फैमिली कोर्ट के आदेश के खिलाफ पत्नी ने हाईकोर्ट में अपील की। उसकी ओर से कहा गया कि वह अपनी इच्छा से मायके में नहीं रही, बल्कि ससुराल में दहेज की मांग को लेकर उसके साथ कथित मारपीट और मानसिक-शारीरिक प्रताड़ना की गई।

अपील में 2 जुलाई 2018 की घटना का भी उल्लेख किया गया। पत्नी के अनुसार, उस दौरान उसके साथ मारपीट की गई, जिससे उसका दांत टूट गया और उसे कमरे में बंद कर दिया गया। बाद में वह किसी तरह गुरुद्वारे पहुंची और अपने स्वजनों तथा पुलिस को घटना की सूचना दी।

हाईकोर्ट ने क्रूरता के आरोप पर क्या कहा?

हाईकोर्ट ने रिकॉर्ड में मौजूद साक्ष्यों और सुप्रीम कोर्ट के पूर्व निर्णयों का परीक्षण करते हुए कहा कि सामान्य वैवाहिक मतभेद और नोक-झोंक को अपने आप क्रूरता नहीं माना जा सकता।

कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि केवल कानूनी संरक्षण मांगने या आपराधिक मामला दर्ज कराने को पति के प्रति क्रूरता नहीं माना जा सकता। इसके लिए यह साबित करना जरूरी होगा कि पत्नी की ओर से शुरू की गई कार्यवाही झूठी, दुर्भावनापूर्ण या मनगढ़ंत थी।

केवल अलग रहना परित्याग नहीं

परित्याग के आरोप पर भी हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण टिप्पणी की। कोर्ट ने कहा कि पति-पत्नी का अलग रहना मात्र परित्याग साबित करने के लिए पर्याप्त नहीं है। इसके लिए यह भी साबित करना जरूरी है कि संबंधित पक्ष ने वैवाहिक संबंध को स्थायी रूप से समाप्त करने का इरादा बना लिया था।

रिकॉर्ड में यह सामने आया कि पत्नी ने कई मौकों पर पति के साथ रहने की इच्छा जताई थी। समझौते के बाद वह ससुराल वापस भी गई थी। इन परिस्थितियों को देखते हुए कोर्ट ने परित्याग के आरोप को भी पर्याप्त रूप से साबित नहीं माना।

दांत टूटने की चोट से जुड़े मेडिकल दस्तावेज अहम

हाईकोर्ट ने पत्नी की चोट से संबंधित मेडिकल दस्तावेजों को भी महत्वपूर्ण माना। रिकॉर्ड में दांत टूटने से संबंधित चोट के साक्ष्य मौजूद थे। कोर्ट ने माना कि इन परिस्थितियों में पत्नी के अलग रहने के पीछे उचित कारण होने की बात सामने आती है।

हाईकोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि पति क्रूरता और परित्याग के अपने आरोपों को पर्याप्त साक्ष्यों के आधार पर साबित नहीं कर सका।

फैमिली कोर्ट का तलाक आदेश रद्द

इन सभी परिस्थितियों को देखते हुए डिवीजन बेंच ने महासमुंद फैमिली कोर्ट की 7 नवंबर 2023 की तलाक की डिक्री रद्द कर दी और पत्नी की अपील स्वीकार कर ली।

फैसले का मुख्य निष्कर्ष यह है कि पत्नी द्वारा वैधानिक अधिकारों के तहत आपराधिक या कानूनी कार्रवाई करना अपने आप में पति के प्रति क्रूरता नहीं माना जा सकता; मामले की परिस्थितियों और कार्यवाही की प्रकृति के आधार पर ही इसका आकलन किया जाएगा।

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