November 6, 2026

बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने एक अहम फैसले में कहा है कि पत्नी द्वारा घरेलू हिंसा, दहेज प्रताड़ना या धारा 498-A के तहत आपराधिक मामला दर्ज कराना मात्र पति के प्रति क्रूरता नहीं माना जा सकता। कोर्ट ने कहा कि जब तक यह साबित न हो कि पत्नी की ओर से शुरू की गई आपराधिक कार्यवाही झूठी, दुर्भावनापूर्ण या मनगढ़ंत थी, तब तक केवल कानूनी कार्रवाई को तलाक का आधार नहीं बनाया जा सकता।

डिवीजन बेंच ने महासमुंद फैमिली कोर्ट के तलाक के आदेश को रद्द करते हुए पत्नी की अपील स्वीकार कर ली। मामला महासमुंद निवासी जसमीत सिंह मक्कड़ और रज्जी कौर के वैवाहिक विवाद से जुड़ा है। दोनों का विवाह 10 दिसंबर 2011 को सिख रीति-रिवाज से हुआ था और उनका एक आठ वर्षीय बेटा है।

पति ने पत्नी पर लगाए थे ये आरोप

पति ने वर्ष 2021 में महासमुंद फैमिली कोर्ट में सिविल सूट दायर किया था। उसने आरोप लगाया कि पत्नी छोटी-छोटी बातों को लेकर विवाद करती है, ससुराल वालों का सम्मान नहीं करती और बिना उचित कारण मायके चली जाती है। पति का यह भी आरोप था कि पत्नी उस पर अलग रहने का दबाव बनाती थी।

पति ने 498-A के तहत दर्ज मामले को भी मानसिक प्रताड़ना बताते हुए तलाक की मांग की थी। फैमिली कोर्ट ने 7 नवंबर 2023 को पति के पक्ष में तलाक की डिक्री पारित कर दी।

पत्नी ने मारपीट और दहेज प्रताड़ना का लगाया आरोप

फैमिली कोर्ट के फैसले के खिलाफ पत्नी ने हाईकोर्ट में अपील की। उसकी ओर से कहा गया कि वह स्वेच्छा से मायके में नहीं रही, बल्कि ससुराल में दहेज की मांग को लेकर उसके साथ कथित मारपीट और मानसिक-शारीरिक प्रताड़ना की गई।

पत्नी ने 2 जुलाई 2018 की घटना का जिक्र करते हुए बताया कि उसके साथ मारपीट की गई, जिससे उसका दांत टूट गया। उसने आरोप लगाया कि उसे कमरे में बंद कर दिया गया था। बाद में वह किसी तरह गुरुद्वारे पहुंची और अपने स्वजनों तथा पुलिस को घटना की सूचना दी।

हाईकोर्ट ने क्रूरता के आरोप पर क्या कहा?

हाईकोर्ट ने रिकॉर्ड में मौजूद साक्ष्यों और सुप्रीम कोर्ट के पूर्व फैसलों का परीक्षण किया। कोर्ट ने कहा कि सामान्य वैवाहिक मतभेद और पति-पत्नी के बीच होने वाली नोकझोंक को अपने आप क्रूरता नहीं माना जा सकता।

कोर्ट ने यह भी कहा कि केवल कानूनी संरक्षण मांगना या आपराधिक मामला दर्ज कराना पति के प्रति क्रूरता नहीं है। इसके लिए यह साबित करना जरूरी है कि संबंधित कानूनी कार्यवाही झूठी और दुर्भावनापूर्ण थी।

सिर्फ अलग रहना परित्याग साबित नहीं करता

परित्याग के आरोप पर हाईकोर्ट ने कहा कि पति-पत्नी का अलग रहना मात्र परित्याग साबित करने के लिए पर्याप्त नहीं है। इसके लिए यह भी साबित करना जरूरी है कि संबंधित पक्ष ने वैवाहिक संबंध को स्थायी रूप से खत्म करने का पक्का इरादा बना लिया था।

रिकॉर्ड के अनुसार, पत्नी ने कई मौकों पर पति के साथ रहने की इच्छा जताई थी और समझौते के बाद वह वापस ससुराल भी गई थी। इन परिस्थितियों को भी कोर्ट ने अपने निर्णय में महत्वपूर्ण माना।

मेडिकल दस्तावेजों को भी माना महत्वपूर्ण

हाईकोर्ट ने पत्नी की चोट से जुड़े मेडिकल दस्तावेजों पर भी गौर किया। रिकॉर्ड में दांत टूटने की चोट से संबंधित साक्ष्य मौजूद थे। कोर्ट ने माना कि इन परिस्थितियों में पत्नी के अलग रहने के पीछे उचित कारण होने की बात सामने आती है।

कोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि पति क्रूरता और परित्याग के अपने आरोपों को पर्याप्त साक्ष्यों के आधार पर साबित नहीं कर सका।

तलाक की डिक्री रद्द, पत्नी की अपील मंजूर

इन परिस्थितियों में डिवीजन बेंच ने महासमुंद फैमिली कोर्ट द्वारा 7 नवंबर 2023 को पारित तलाक की डिक्री को रद्द कर दिया और पत्नी की अपील स्वीकार कर ली।

फैसले में कोर्ट ने स्पष्ट किया कि वैधानिक अधिकारों के तहत पत्नी द्वारा की गई कानूनी कार्रवाई को केवल इस आधार पर पति के प्रति क्रूरता नहीं माना जा सकता कि उसके खिलाफ आपराधिक मामला दर्ज हुआ है। मामले की परिस्थितियों और उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर ही यह तय किया जाना होगा कि कार्यवाही झूठी या दुर्भावनापूर्ण थी या नहीं।

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