June 17, 2026

मामला क्या है?

छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय में ‘श्री रविशंकर जी महाराज बनाम सीबीआई’ मामले की सुनवाई के दौरान फोन इंटरसेप्शन (कॉल टैपिंग/रिकॉर्डिंग) से प्राप्त साक्ष्यों की वैधता पर महत्वपूर्ण कानूनी प्रश्न उठाया गया।

मामले की सुनवाई रमेश सिन्हा और रवींद्र कुमार अग्रवाल की डिवीजन बेंच ने की।

याचिकाकर्ता की मुख्य दलील

याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता मनु शर्मा ने दूरसंचार नियम, 2024 के नियम 3(3)(b) का हवाला देते हुए कहा कि:

  • 28 जून 2025 को जारी फोन इंटरसेप्शन आदेश को 7 कार्य दिवसों के भीतर रिव्यू कमेटी के समक्ष अनुमोदन के लिए रखा जाना आवश्यक था।
  • यदि निर्धारित समय में रिव्यू कमेटी इसकी पुष्टि नहीं करती है, तो इंटरसेप्शन आदेश स्वतः प्रभावहीन हो जाता है।
  • ऐसी स्थिति में उसके बाद कॉल टैपिंग से प्राप्त साक्ष्यों को अदालत में स्वीकार नहीं किया जाना चाहिए।

हाईकोर्ट ने क्या कहा?

कोर्ट ने पाया कि:

  • मूल याचिका में 28 जून 2025 के इंटरसेप्शन आदेश को सीधे चुनौती नहीं दी गई थी।
  • यह मुद्दा बाद में एक अंतरिम आवेदन के माध्यम से जोड़ा गया।
  • याचिकाकर्ता द्वारा मौखिक रूप से उठाए गए नए कानूनी आधार लिखित याचिका में स्पष्ट रूप से दर्ज नहीं थे।

इसलिए अदालत ने:

  • याचिकाकर्ता को 24 घंटे के भीतर विस्तृत शपथपत्र दाखिल करने का निर्देश दिया।
  • उसकी प्रति सीबीआई के अधिवक्ता को देने को कहा।
  • केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो को भी केंद्र सरकार और सक्षम अधिकारियों से निर्देश प्राप्त कर 24 जून 2026 तक जवाबी हलफनामा दाखिल करने का आदेश दिया।

कानूनी महत्व

यह मामला केवल एक अभियुक्त तक सीमित नहीं है। यदि अदालत यह मान लेती है कि:

  • इंटरसेप्शन आदेश की समयबद्ध समीक्षा अनिवार्य थी, और
  • उसका पालन नहीं हुआ,

तो फोन टैपिंग से प्राप्त साक्ष्यों की स्वीकार्यता पर व्यापक प्रभाव पड़ सकता है। इससे भविष्य में जांच एजेंसियों द्वारा इलेक्ट्रॉनिक निगरानी और उससे प्राप्त साक्ष्यों के उपयोग के लिए अधिक कठोर प्रक्रियात्मक मानकों की आवश्यकता पड़ सकती है।

आगे क्या होगा?

मामले की अगली सुनवाई 24 जून 2026 को होगी। उस दिन अदालत यह विचार कर सकती है कि कथित प्रक्रियात्मक त्रुटि के कारण फोन टैपिंग से प्राप्त साक्ष्य कानूनी रूप से ग्राह्य हैं या नहीं।

यह ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि अभी हाईकोर्ट ने इस मुद्दे पर अंतिम निर्णय नहीं दिया है। फिलहाल अदालत ने केवल दोनों पक्षों से विस्तृत शपथपत्र और स्पष्टीकरण मांगा है।

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