छत्तीसगढ़ के विश्व प्रसिद्ध ऐतिहासिक बस्तर दशहरा की महत्वपूर्ण रस्म मावली परघाव के लिए मां दंतेश्वरी की पावन डोली और राजछत्र रविवार को दंतेवाड़ा से जगदलपुर के लिए रवाना हो गए। शारदीय नवरात्र की अष्टमी के अवसर पर गाजे-बाजे, पारंपरिक वाद्य यंत्रों, लोक नृत्य और जयकारों के बीच मां की डोली को भावभीनी विदाई दी गई। इस दौरान पूरा दंतेवाड़ा भक्तिमय माहौल में डूबा नजर आया।

जयकारों के बीच मां दंतेश्वरी की डोली को दी गई विदाई
मां दंतेश्वरी की डोली की विदाई के दौरान हजारों श्रद्धालु मौजूद रहे। भक्त मां के जयकारे लगाते हुए यात्रा में शामिल हुए। पारंपरिक वाद्य यंत्रों और लोक नृत्य ने पूरे माहौल को भक्तिमय बना दिया। वहीं, मंदिर के मुख्य द्वार पर पुलिस बल ने सलामी देकर मां दंतेश्वरी को सम्मान अर्पित किया।
क्या है मावली परघाव की परंपरा?
मावली परघाव बस्तर दशहरा की सबसे महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक रस्मों में से एक है। मान्यता के अनुसार, यह परंपरा करीब 800 वर्षों से चली आ रही है। इस रस्म के तहत मां दंतेश्वरी की डोली दंतेवाड़ा से जगदलपुर पहुंचती है, जहां मावली माता से उनका पारंपरिक मिलन होता है।
यह परंपरा बस्तर की आदिवासी आस्था, राजपरंपरा और सांस्कृतिक एकता का प्रतीक मानी जाती है। बस्तर दशहरा में निभाई जाने वाली यह रस्म क्षेत्र की विशिष्ट धार्मिक और सांस्कृतिक विरासत को दर्शाती है।
निर्धारित पूजा स्थलों पर रुकते हुए जगदलपुर पहुंचेगी डोली
दंतेवाड़ा से रवाना हुई मां दंतेश्वरी की डोली निर्धारित पूजा स्थलों पर रुकते हुए जगदलपुर पहुंचेगी। वहां बस्तर दशहरा की ऐतिहासिक परंपराओं और धार्मिक अनुष्ठानों का निर्वहन किया जाएगा।
निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार, मां दंतेश्वरी की डोली और राजछत्र 27 अक्टूबर को वापस दंतेवाड़ा के लिए रवाना होंगे। इस यात्रा के साथ बस्तर की सदियों पुरानी आस्था, परंपरा और सांस्कृतिक विरासत एक बार फिर जीवंत हो उठी है।
आस्था और संस्कृति का अनूठा संगम है बस्तर दशहरा
बस्तर दशहरा अपनी विशिष्ट परंपराओं और लंबे आयोजन के लिए देशभर में जाना जाता है। मावली परघाव जैसी रस्में इस पर्व को अलग पहचान देती हैं। मां दंतेश्वरी की डोली का जगदलपुर पहुंचना श्रद्धालुओं के लिए विशेष महत्व रखता है और बस्तर की सांस्कृतिक एकता को भी उजागर करता है।