छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट का फैसला:
- हाईकोर्ट ने कहा कि अनुच्छेद 161 के तहत राज्यपाल की क्षमादान (दया याचिका) की शक्ति एक स्वतंत्र संवैधानिक अधिकार है।
- यदि राज्यपाल किसी दया याचिका को एक बार खारिज कर देते हैं, तो छत्तीसगढ़ जेल नियमावली, 1968 के तहत उसी याचिका पर पुनर्विचार का कोई प्रावधान नहीं है।
- न्यायालय ने यह भी कहा कि कार्यपालिका (Executive) के ऐसे निर्णयों में अदालत तभी हस्तक्षेप करेगी, जब निर्णय दुर्भावनापूर्ण, मनमाना या कानून के विरुद्ध हो।

मामला क्या था?
- बिलासपुर के नीरज माली उर्फ गोलू को वर्ष 2001 में हत्या के मामले में आजीवन कारावास की सजा हुई थी।
- हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट से भी उसकी सजा बरकरार रही।
- वर्ष 2016 में उसने राज्यपाल के समक्ष दया याचिका दायर की थी। जेल और जिला प्रशासन ने उसके अच्छे आचरण के आधार पर समयपूर्व रिहाई की सिफारिश भी की थी।
क्या हुआ आगे?
- 24 मार्च 2023 को राज्यपाल ने दया याचिका खारिज कर दी।
- इसके बाद कैदी की पत्नी ने मानवीय और पारिवारिक आधारों पर पुनर्विचार का आवेदन दिया।
- गृह (जेल) विभाग ने 9 जुलाई 2025 को यह कहते हुए आवेदन खारिज कर दिया कि जेल नियमों में पुनर्विचार का प्रावधान नहीं है।
हाईकोर्ट का निष्कर्ष:
- कोर्ट ने माना कि पत्नी का आवेदन नई दया याचिका नहीं, बल्कि पहले से खारिज याचिका पर पुनर्विचार की मांग था।
- रिकॉर्ड से यह भी स्पष्ट हुआ कि याचिका केवल कम सजा अवधि के कारण नहीं, बल्कि अपराध की गंभीरता और क्रूरता को ध्यान में रखकर भी खारिज की गई थी।
- इसलिए हाईकोर्ट ने रिट याचिका खारिज कर दी।
कैदी के लिए आगे का रास्ता:
- अदालत ने स्पष्ट किया कि यह फैसला भविष्य के सभी विकल्प बंद नहीं करता।
- यदि कानून के अनुसार उचित समय पर परिस्थितियाँ बनती हैं, तो कैदी नई दया याचिका या समयपूर्व रिहाई (Premature Release) के लिए नया आवेदन दे सकता है, जिस पर सक्षम प्राधिकारी स्वतंत्र रूप से विचार करेंगे।