June 17, 2026

हाईकोर्ट का फैसला

छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय ने त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में कहा कि चुनाव याचिका में विवाद के बिंदु तय हो जाने के बाद बिना साक्ष्य और गवाही दर्ज किए उसे खारिज नहीं किया जा सकता। अदालत ने एसडीएम कोर्ट द्वारा चुनाव याचिका बंद करने के आदेश को निरस्त कर दिया और मामले को पुनः सुनवाई के लिए वापस भेज दिया।

मामला क्या था?

  • मामला हसुवा ग्राम पंचायत के सरपंच चुनाव से संबंधित है।
  • चुनाव में गायत्री शर्मा और रितु अतुल केशरवानी उम्मीदवार थीं।
  • मतगणना के बाद रितु केशरवानी को विजयी घोषित किया गया।
  • परिणाम से असंतुष्ट गायत्री शर्मा ने छत्तीसगढ़ पंचायत राज अधिनियम, 1993 के तहत चुनाव याचिका दायर की।

याचिका में आरोप

याचिकाकर्ता का आरोप था कि:

  • निर्वाचित सरपंच ने अपने नामांकन पत्र पर स्वयं हस्ताक्षर नहीं किए थे।
  • हस्ताक्षर किसी अन्य व्यक्ति द्वारा किए गए थे।
  • यह कथित रूप से भ्रष्ट आचरण की श्रेणी में आता है।

इसी आधार पर हस्ताक्षरों की जांच के लिए भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 45 के तहत हैंडराइटिंग विशेषज्ञ से परीक्षण कराने का आवेदन भी दिया गया था।

एसडीएम कोर्ट ने क्या किया?

सुनवाई के दौरान:

  • विवाद के बिंदु तय कर दिए गए थे।
  • लेकिन गवाही और साक्ष्य की प्रक्रिया पूरी किए बिना 15 अप्रैल 2026 को एसडीएम कोर्ट ने चुनाव याचिका पर आगे की सुनवाई बंद कर दी।

हाईकोर्ट की टिप्पणी

हाईकोर्ट ने माना कि:

  • यह प्रक्रिया छत्तीसगढ़ पंचायत (निर्वाचन याचिका, भ्रष्ट आचरण और सदस्यता के लिए अयोग्यता) नियम, 1995 की भावना के अनुरूप नहीं थी।
  • जब विवादित तथ्य मौजूद हों, तब दोनों पक्षों को साक्ष्य प्रस्तुत करने और गवाही देने का अवसर दिया जाना आवश्यक है।
  • चुनाव न्यायाधिकरण मनमाने ढंग से कार्यवाही समाप्त नहीं कर सकता।

कोर्ट के निर्देश

  • एसडीएम कोर्ट का आदेश रद्द किया गया।
  • मामले को पुनः सुनवाई के लिए वापस भेजा गया।
  • दोनों पक्षों की गवाही दर्ज कर नियमानुसार सुनवाई पूरी करने का निर्देश दिया गया।
  • पूरे मामले का निपटारा 60 दिनों के भीतर करने को कहा गया।

फैसले का महत्व

यह निर्णय पंचायत चुनाव संबंधी विवादों में प्राकृतिक न्याय (Natural Justice) और उचित सुनवाई (Fair Hearing) के सिद्धांतों को मजबूत करता है। इससे यह स्पष्ट संदेश जाता है कि चुनाव याचिकाओं का निपटारा केवल प्रक्रियात्मक आधार पर नहीं, बल्कि उपलब्ध साक्ष्यों और गवाहों की पूरी जांच के बाद ही किया जाना चाहिए।

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