छत्तीसगढ़ राज्य पिछड़ा वर्ग आयोग का काम सलाह देना और सिफारिश करना है, न कि किसी पक्ष से पैसे की वसूली (रिकवरी) का आदेश देना।
- छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय ने कहा कि छत्तीसगढ़ राज्य पिछड़ा वर्ग आयोग अधिनियम, 1995 के तहत आयोग को न्यायालय जैसी शक्तियां प्राप्त नहीं हैं।
- आयोग को जांच के दौरान सिविल कोर्ट जैसी कुछ प्रक्रियात्मक शक्तियां मिल सकती हैं, लेकिन इससे वह सिविल कोर्ट नहीं बन जाता और न ही वह धन-वसूली का आदेश दे सकता है।

मामले के तथ्य:
- कमला मोटर्स ने लगभग ₹21 लाख में हार्वेस्टर बेचने का सौदा किया था।
- खरीदार ने ₹30,000 अग्रिम राशि दी।
- बैंक फाइनेंस और कोविड-19 के कारण सौदा समय पर पूरा नहीं हो सका।
- बाद में खरीदार ने सौदा रद्द कर दिया और आयोग सहित विभिन्न अधिकारियों से शिकायत की।
- आयोग ने कलेक्टर को निर्देश दिया कि विक्रेता से ₹1,26,500 वसूलकर खरीदार को दिया जाए।
हाईकोर्ट का निर्णय:
- अदालत ने माना कि यह एक व्यावसायिक (कमर्शियल) विवाद था।
- आयोग द्वारा रिकवरी का आदेश देना उसके अधिकार क्षेत्र (Jurisdiction) से बाहर था।
- इसलिए आयोग का 23 सितंबर 2022 का आदेश वैधानिक अधिकारों से परे (Ultra Vires) माना गया और उसे टिकाऊ नहीं माना गया।
इस फैसले का महत्व:
- यह निर्णय स्पष्ट करता है कि वैधानिक आयोगों की शक्तियां उनके अधिनियम से ही निर्धारित होती हैं।
- यदि किसी आयोग को कानून में धन-वसूली या बाध्यकारी आदेश देने का अधिकार नहीं दिया गया है, तो वह ऐसा आदेश जारी नहीं कर सकता।
- ऐसे कमर्शियल विवादों में धन-वसूली का अधिकार सामान्यतः सक्षम न्यायालय या कानून द्वारा अधिकृत प्राधिकारी के पास होता है।