September 14, 2026

इंदौर: अवंतिका गैस पाइपलाइन विस्फोट मामले में एक बार फिर प्रशासन की कार्यप्रणाली सवालों के घेरे में आ गई है। हादसे में गंभीर रूप से झुलसे चार लोगों के इलाज और आर्थिक सहायता को लेकर मध्य प्रदेश हाईकोर्ट में चल रही सुनवाई के दौरान प्रशासन द्वारा प्रस्तुत शपथ पत्र पर विवाद खड़ा हो गया है।

गंभीर रूप से झुलसी सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर जिनी झाला (गिरिराजकुमारी झाला) को हाईकोर्ट के निर्देश पर एयरलिफ्ट कर अहमदाबाद के जायडस हॉस्पिटल में भर्ती कराया गया है। इसी दौरान याचिकाकर्ता ने आरोप लगाया कि प्रशासन ने अदालत में दायर शपथ पत्र में दावा किया कि पीड़ितों को स्वास्थ्य सहायता राशि का भुगतान कर दिया गया है, जबकि वास्तविकता में भुगतान नहीं हुआ था।

याचिकाकर्ता ने उठाए गंभीर सवाल

याचिकाकर्ता का कहना है कि यदि सरकारी अधिकारी न्यायालय में गलत जानकारी प्रस्तुत करते हैं, तो यह बेहद गंभीर मामला है। उनका आरोप है कि अदालत को गुमराह करने का प्रयास नहीं होना चाहिए। उन्होंने सवाल उठाया कि जब भुगतान हुआ ही नहीं था, तो शपथ पत्र में भुगतान होने का उल्लेख किस आधार पर किया गया। साथ ही इस मामले में जिम्मेदारी तय करने की मांग भी की गई।

सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने प्रशासन को निर्देश दिए कि सभी पीड़ितों को सात दिनों के भीतर भुगतान सुनिश्चित किया जाए और इसकी जानकारी अदालत को दी जाए। मामले की अगली सुनवाई सात दिन बाद होगी।

SDM घनश्याम धनगर की सफाई

पूरे विवाद पर एसडीएम घनश्याम धनगर ने कहा कि शपथ पत्र में जानबूझकर कोई गलत जानकारी नहीं दी गई। उनके अनुसार यह केवल टाइपिंग की त्रुटि थी।

उन्होंने बताया कि शपथ पत्र में “पेमेंट प्रोसेस में है” लिखा जाना था, लेकिन टाइपिंग के दौरान गलती से “पेमेंट हो गया” दर्ज हो गया। जैसे ही त्रुटि का पता चला, इसकी जानकारी तत्काल हाईकोर्ट को दे दी गई।

एसडीएम ने यह भी कहा कि अदालत ने इस पर किसी प्रकार की नाराजगी व्यक्त नहीं की और न ही उनसे माफी मांगी गई। उनके मुताबिक बॉम्बे अस्पताल के इलाज संबंधी भुगतान किए जा चुके हैं, जबकि अन्य भुगतान की प्रक्रिया जारी है और निर्धारित समय सीमा के भीतर पूरी कर दी जाएगी।

प्रशासन की कार्यप्रणाली पर उठे सवाल

हालांकि प्रशासन इस पूरे मामले को टाइपिंग की गलती बता रहा है, लेकिन हाईकोर्ट में दाखिल शपथ पत्र जैसे महत्वपूर्ण दस्तावेज में तथ्यात्मक त्रुटि सामने आने के बाद प्रशासनिक कार्यप्रणाली पर सवाल उठने लगे हैं।

कानूनी जानकारों का मानना है कि न्यायालय में प्रस्तुत शपथ पत्र पूरी तरह सत्यापित दस्तावेज होते हैं। ऐसे में किसी भी प्रकार की तथ्यात्मक गलती प्रशासन की जवाबदेही और कार्यप्रणाली पर प्रश्नचिह्न खड़ा करती है।

अब सात दिन पर टिकी निगाहें

फिलहाल हाईकोर्ट ने प्रशासन को स्पष्ट निर्देश दिए हैं कि सात दिनों के भीतर पीड़ितों को भुगतान कर इसकी जानकारी अदालत को दी जाए। अब अगली सुनवाई में यह स्पष्ट होगा कि प्रशासन निर्धारित समय में आदेश का पालन करता है या मामले में अदालत की सख्ती आगे भी जारी रहती है।

About The Author

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *