नारायणपुर। जिला मुख्यालय से महज 23 किलोमीटर दूर पहाड़ों के बीच बसा गुमियाबेड़ा गांव आज भी पक्की सड़क का इंतजार कर रहा है। नेशनल हाईवे-130D गांव से करीब चार किलोमीटर दूर है, लेकिन सड़क सुविधा नहीं होने के कारण यह दूरी ग्रामीणों के लिए बेहद कठिन सफर में बदल जाती है।

ग्रामीणों के मुताबिक वे पिछले करीब तीन दशकों से पहाड़ों को काटकर आने-जाने के लिए खुद रास्ता तैयार करते आ रहे हैं। बारिश के दौरान पहाड़ों से बहने वाला पानी इन कच्चे रास्तों को कई बार बहा ले जाता है। इसके बाद ग्रामीणों को दोबारा रास्ता बनाने के लिए पहाड़ काटने पड़ते हैं।
नक्सलवाद खत्म होने के बाद भी नहीं बदली तस्वीर
ग्रामीणों का कहना है कि नक्सलवाद के दौर में इलाके में सड़क, पुल-पुलिया और दूसरे विकास कार्यों को लेकर गंभीर चुनौतियां थीं। इसी वजह से गांव तक बुनियादी सुविधाएं नहीं पहुंच सकीं। ग्रामीणों ने जोखिम उठाकर अपने स्तर पर रास्ते बनाए।
अब क्षेत्र में नक्सल गतिविधियों का प्रभाव कम होने के बावजूद सड़क की समस्या दूर नहीं हुई है। ग्रामीणों का कहना है कि वर्षों से सड़क निर्माण की मांग की जा रही है, लेकिन अब तक उन्हें पक्की सड़क नहीं मिल सकी है।
राशन के लिए 7 किलोमीटर पैदल सफर
गांव तक सड़क नहीं होने का सीधा असर ग्रामीणों की रोजमर्रा की जिंदगी पर पड़ रहा है। ग्रामीणों के मुताबिक राशन लेने के लिए उन्हें करीब 7 किलोमीटर पैदल जाना पड़ता है। राशन मिलने के बाद उसे कंधे पर लादकर वापस गांव तक लाना पड़ता है।
बारिश के मौसम में मुश्किल और बढ़ जाती है। नदी-नाले उफान पर होने के कारण ग्रामीणों को कई जगह जोखिम उठाकर पानी पार करना पड़ता है।
मरीज और गर्भवती महिलाओं को कांवड़ के सहारे ले जाने की मजबूरी
सबसे गंभीर स्थिति किसी ग्रामीण के बीमार पड़ने या गर्भवती महिला को प्रसव पीड़ा होने पर बनती है। ग्रामीणों के अनुसार सड़क और वाहन की सुविधा नहीं होने के कारण मरीजों और गर्भवती महिलाओं को कांवड़ के सहारे पहाड़ी रास्तों और नदी-नालों को पार कर स्वास्थ्य केंद्र तक ले जाना पड़ता है।
ग्रामीणों का कहना है कि गांव तक एंबुलेंस पहुंचने की सुविधा हो जाए तो बड़ी समस्या का समाधान हो सकता है। बारिश के दौरान स्वास्थ्य संबंधी आपात स्थिति में अस्पताल तक पहुंचना उनके लिए बड़ी चुनौती बन जाता है।
सड़क के लिए कई बार अधिकारियों से लगाई गुहार
ग्रामीणों का कहना है कि सड़क निर्माण की मांग को लेकर वे कई बार सरकारी दफ्तरों और जनप्रतिनिधियों के पास अपनी समस्या रख चुके हैं। इसके बावजूद वर्षों से स्थिति में अपेक्षित बदलाव नहीं आया।
ग्रामीणों की प्रमुख मांग है कि गांव को मुख्य सड़क से जोड़ा जाए, ताकि बारिश के दौरान भी आवागमन सुचारू रहे और जरूरत पड़ने पर एंबुलेंस समेत अन्य वाहन गांव तक पहुंच सकें।
NH-130D करीब, फिर भी गांव तक पहुंचना मुश्किल
गुमियाबेड़ा से नेशनल हाईवे-130D की दूरी करीब चार किलोमीटर है। इसके बावजूद पक्की सड़क नहीं होने के कारण ग्रामीणों के लिए यह दूरी तय करना आसान नहीं है। सड़क के अभाव का असर राशन, स्वास्थ्य, शिक्षा और अन्य सरकारी सुविधाओं तक पहुंच पर भी पड़ रहा है।
तीन दशक से रास्ते के लिए संघर्ष कर रहे ग्रामीणों को अब उम्मीद है कि क्षेत्र में बदले हालात के बाद उनके गांव तक भी सड़क पहुंचेगी।
मौसम खुलते ही सड़क निर्माण का काम शुरू होगा: CEO
मामले में जनपद पंचायत ओरछा के सीईओ अमित भाटिया ने कहा कि यह क्षेत्र लंबे समय तक नक्सलवाद से प्रभावित रहा है और यहां परिस्थितियां चुनौतीपूर्ण थीं। अब कुछ समय से हालात अनुकूल हुए हैं।
उन्होंने कहा कि मौसम खुलने के बाद क्षेत्र में कई सड़कों का निर्माण कराया जाएगा और गुमियाबेड़ा की सड़क भी बनाई जाएगी। इससे ग्रामीणों को जल्द बेहतर आवागमन की सुविधा मिलने की उम्मीद है।