November 6, 2026

रायपुर। संकेत साहित्य समिति ने अपना 46वां स्थापना दिवस साहित्यिक गरिमा के साथ मनाया। इस अवसर पर भाषाविद्, साहित्यकार एवं साहित्य त्रिवेणी के संपादक डॉ. कुँवर वीर सिंह मार्तण्ड को ‘संकेत साहित्य रत्न सम्मान’ से सम्मानित किया गया। कार्यक्रम में राजभाषा हिंदी पर केंद्रित परिचर्चा के साथ सरस काव्य गोष्ठी का भी आयोजन किया गया।

कार्यक्रम की अध्यक्षता छत्तीसगढ़ साहित्य अकादमी के अध्यक्ष शशांक शर्मा ने की। भाषाविद् एवं वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. चितरंजन कर, लब्धप्रतिष्ठ व्यंग्यकार गिरीश पंकज और हिंदी विभागाध्यक्ष डॉ. रेशमा अंसारी सारस्वत अतिथि के रूप में उपस्थित रहे।

हिंदी भारतीय संस्कृति की संवाहिका: डॉ. माणिक विश्वकर्मा

कार्यक्रम की शुरुआत मां सरस्वती की पूजा-अर्चना से हुई। इसके बाद समिति की ओर से अतिथियों का अंगवस्त्र और श्रीफल भेंट कर सम्मान किया गया।

संकेत साहित्य समिति के संस्थापक एवं प्रांतीय अध्यक्ष डॉ. माणिक विश्वकर्मा ‘नवरंग’ ने अपने उद्बोधन में राजभाषा हिंदी के महत्व पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि हिंदी केवल एक भाषा नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति की संवाहिका है। यह देश-विदेश में रहने वाले करोड़ों लोगों को आपस में जोड़ने का काम करती है।

हिंदी के सामने संपर्क भाषा के रूप में संकट नहीं: शशांक शर्मा

कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे शशांक शर्मा ने कहा कि संपर्क भाषा के रूप में हिंदी के सामने कोई संकट नहीं है। उन्होंने कहा कि देश में हिंदी को अंग्रेजी से चुनौती मिल रही है, क्योंकि अंग्रेजी को ज्ञान की भाषा के रूप में मान्यता दी गई है।

उन्होंने हिंदी की सामाजिक और सांस्कृतिक लोकप्रियता में लगातार वृद्धि का उल्लेख करते हुए साहित्य में हिंदी के सरलीकरण को समय की आवश्यकता बताया।

हिंदी हमारी सांस्कृतिक चेतना की भाषा: डॉ. कुँवर वीर सिंह

सम्मानित मुख्य अतिथि डॉ. कुँवर वीर सिंह ‘मार्तण्ड’ ने हिंदी के इतिहास और महत्व पर अपने विचार रखे। उन्होंने कहा कि हिंदी केवल संवाद की भाषा नहीं, बल्कि हमारी स्मृतियों, सांस्कृतिक चेतना, संवेदना और सामूहिक विचारधारा की भाषा भी है।

उन्होंने राजभाषा हिंदी को केंद्र में रखकर आयोजित कार्यक्रम की सराहना करते हुए इसे साहित्यिक चेतना, हिंदी-प्रेम और रचनात्मक संवाद का सुंदर उदाहरण बताया।

साहित्यकारों ने हिंदी की भूमिका पर रखे विचार

डॉ. चितरंजन कर ने कहा कि भाषा संस्कृति और चेतना का स्वरूप होती है। उन्होंने हिंदी को अपने जीवन-जगत और व्यापक दृष्टि से जुड़ी भाषा बताया।

व्यंग्यकार गिरीश पंकज ने कहा कि हिंदी का प्रभाव पूरी दुनिया में बढ़ रहा है और वह कई देशों में संवैधानिक भाषा के रूप में भी स्थापित है। उन्होंने हिंदी के भविष्य को लेकर सकारात्मक विचार व्यक्त किए।

वहीं डॉ. रेशमा अंसारी ने वर्तमान परिवेश में हिंदी की भूमिका पर प्रकाश डालते हुए कृत्रिम बुद्धिमत्ता के माध्यम से हिंदी के विकास की संभावनाओं को रेखांकित किया। उन्होंने देवनागरी लिपि के संरक्षण पर भी जोर दिया।

विभिन्न जिलों से पहुंचे कवि-कवयित्रियों ने किया काव्य पाठ

कार्यक्रम का सफल संचालन पल्लवी झा ने किया। काव्य गोष्ठी में प्रदेश के विभिन्न जिलों से पहुंचे कवि-कवयित्रियों ने अपनी रचनाओं का पाठ किया।

काव्य पाठ करने वालों में डॉ. कुँवर वीर सिंह ‘मार्तण्ड’, डॉ. चितरंजन कर, गिरीश पंकज, डॉ. माणिक विश्वकर्मा ‘नवरंग’, डॉ. रेशमा अंसारी, मीर अली ‘मीर’, उदयभान सिंह चौहान, सुरेंद्र रावल, डॉ. दीनदयाल साहू, मधु मार्तण्ड, संजीव ठाकुर, डॉ. रविंद्र सरकार, पल्लवी झा, सुषमा पटेल, हरीश कोटक, राजकुमार सोनी, छबिलाल सोनी, गणेशदत्त झा, यशवंत यदु, राजेंद्र रायपुरी, विवेक राहटगांवकर और एचएल चंद्राकर सहित अन्य साहित्यकार शामिल रहे।

इसके अलावा दिलीप वरवंडकर, डॉ. सिद्धार्थ श्रीवास्तव, राजेंद्र ओझा, कुमार जगदली, नर्मदा प्रसाद विश्वकर्मा, माधुरी कर, सीमा पांडे, डॉ. कोमल प्रसाद राठौर, मुरलीधर गोंडाने ‘नीर’, ऋषि साव, मन्नू लाल यदु ‘नाथ’, डॉ. एनपी यादव, वीरेंद्र शर्मा ‘अनुज’, डॉ. कमल वर्मा, बीबीपी मोदी, भूपेंद्र शर्मा ‘भूप’, डॉ. गोपा शर्मा, कल्याणी तिवारी, विजया ठाकुर, गोपाल सोलंकी, मंजूषा अग्रवाल, प्रीतिरानी तिवारी, शशांक खरे, शोमकांत शर्मा और अमरदीप शर्मा ने भी काव्य गोष्ठी में सहभागिता की।

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