छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने यह स्पष्ट किया कि केवल कर्ज़ की वसूली के लिए बार-बार संपर्क करना, भुगतान मांगना या कानूनी कार्रवाई की चेतावनी देना अपने आप में आत्महत्या के लिए दुष्प्रेरण (Abetment of Suicide) नहीं माना जा सकता।
मुख्य बिंदु:
- आत्महत्या के लिए दुष्प्रेरण सिद्ध करने के लिए यह दिखाना आवश्यक होता है कि आरोपी ने आत्महत्या के लिए प्रत्यक्ष उकसावा, प्रोत्साहन या जानबूझकर ऐसा व्यवहार किया हो जिससे व्यक्ति आत्महत्या करने के लिए प्रेरित हुआ हो।
- अदालत ने पाया कि आरोपी द्वारा अपनी बकाया राशि मांगना एक वैध कानूनी अधिकार था।
- रिकॉर्ड में ऐसा कोई ठोस साक्ष्य नहीं मिला जिससे यह साबित हो कि आरोपी ने मृतक को आत्महत्या करने के लिए उकसाया था।
- अदालत ने यह भी माना कि मृतक पर बैंक का भारी ऋण, ट्रैक्टर की जब्ती और आर्थिक संकट जैसी परिस्थितियां मानसिक तनाव का महत्वपूर्ण कारण हो सकती थीं।
- अनुसूचित जनजाति पहचान के आधार पर अपमान या उत्पीड़न के आरोपों के समर्थन में भी पर्याप्त साक्ष्य नहीं मिले।

परिणामस्वरूप:
- आईपीसी की धारा 306 के तहत दी गई 7 वर्ष की सजा रद्द कर दी गई।
- आरोपी को बरी कर दिया गया।
- मृतक पक्ष की सजा बढ़ाने और एससी-एसटी कानून के तहत कार्रवाई की मांग वाली अपील भी खारिज कर दी गई।
कानूनी दृष्टि से यह फैसला इस सिद्धांत को दोहराता है कि किसी व्यक्ति द्वारा अपनी वैध देनदारी की मांग करना और कानूनी उपायों का सहारा लेने की चेतावनी देना सामान्यतः “उकसावे” (instigation) की श्रेणी में नहीं आता। हालांकि प्रत्येक मामले के तथ्य अलग होते हैं; यदि वसूली के दौरान धमकी, अवैध दबाव, लगातार उत्पीड़न या अपमानजनक व्यवहार के ठोस प्रमाण हों, तो न्यायालय अलग निष्कर्ष पर पहुंच सकता है।