November 6, 2026

बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने फूड कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया (FCI) द्वारा व्यावसायिक कर और अन्य शुल्क के नाम पर की गई कटौती को गलत ठहराते हुए रायपुर की एक राइस मिल के पक्ष में पारित वसूली की डिक्री बरकरार रखी है। हालांकि, कोर्ट ने निचली अदालत द्वारा निर्धारित 12 प्रतिशत वार्षिक ब्याज को घटाकर 6 प्रतिशत कर दिया। जस्टिस सुषमा सावंत की सिंगल बेंच ने एफसीआई की अपील को आंशिक रूप से स्वीकार करते हुए यह आदेश दिया।

निचली अदालत के फैसले को एफसीआई ने दी थी चुनौती

मामला रायपुर के गंजपारा स्थित मेसर्स सूरज बेसन एंड राइस मिल से जुड़ा है। रायपुर के द्वितीय अतिरिक्त जिला न्यायाधीश ने 29 अप्रैल 2009 को राइस मिल के पक्ष में आंशिक रूप से वाद स्वीकार करते हुए 2,46,960 रुपये की डिक्री 12 प्रतिशत वार्षिक ब्याज के साथ पारित की थी। एफसीआई ने इसी फैसले को हाईकोर्ट में चुनौती दी थी।

मामले में एफसीआई की ओर से अधिवक्ता बीपी गुप्ता और राइस मिल की ओर से अधिवक्ता बीपी शर्मा तथा मितिशा कोटेचा ने पैरवी की।

खराब अनाज की बिक्री के लिए जारी हुआ था टेंडर

एफसीआई ने अगस्त 1998 में रायपुर के विभिन्न डिपो में खराब खाद्यान्न की बिक्री के लिए टेंडर जारी किया था। राइस मिल ने 1,280.41 मीट्रिक टन खाद्यान्न खरीदने के लिए टेंडर दिया। 11 नवंबर 1998 को एफसीआई ने 11,415 क्विंटल खराब अनाज के लिए उसका टेंडर स्वीकार किया। इस खाद्यान्न की कीमत 65 लाख 38 हजार 110 रुपये तय हुई थी।

राइस मिल ने किस्तों में भुगतान की अनुमति मांगी थी और व्यावसायिक कर हटाने का भी आग्रह किया था। इसके बाद मिल ने 7 जनवरी 1999 को 25 लाख रुपये, 8 जनवरी को 30 लाख रुपये और 14 जनवरी को 10 लाख 38 हजार 110 रुपये जमा किए।

4.54 लाख रुपये का बिल, लेकिन भुगतान नहीं हुआ

राइस मिल का कहना था कि एफसीआई ने जारी बिलों में व्यावसायिक कर सहित अन्य मदों के नाम पर राशि काट ली। अंतिम हिसाब के अनुसार, 11,414 क्विंटल 18 किलो खाद्यान्न के बदले 10,944 क्विंटल 2 किलो माल दिया गया। अंतर की राशि के रूप में 4,54,741 रुपये का बिल प्रस्तुत किया गया, लेकिन एफसीआई ने इसका भुगतान नहीं किया।

इसके बाद राइस मिल ने बकाया राशि और ब्याज की वसूली के लिए सिविल वाद दायर किया। निचली अदालत ने साक्ष्यों के आधार पर 2,46,960 रुपये की वसूली का आदेश दिया था।

एफसीआई ने स्टोरेज शुल्क और दंडात्मक ब्याज को बताया उचित

हाईकोर्ट में एफसीआई ने दलील दी कि टेंडर की शर्तों के अनुसार, भुगतान में देरी होने पर दंडात्मक ब्याज और निर्धारित अवधि में माल नहीं उठाने पर स्टोरेज शुल्क लेना उचित था। एफसीआई ने यह भी कहा कि निचली अदालत द्वारा 12 प्रतिशत वार्षिक ब्याज निर्धारित करना अधिक था।

वहीं, राइस मिल ने निचली अदालत के फैसले का समर्थन करते हुए कहा कि एफसीआई की ओर से की गई कटौतियां टेंडर की शर्तों के अनुरूप नहीं थीं।

गवाह की जिरह में सामने आई व्यावसायिक कर कटौती की बात

हाईकोर्ट ने रिकॉर्ड और साक्ष्यों की समीक्षा के दौरान पाया कि एफसीआई की गवाह लेखा चटर्जी ने जिरह में स्वीकार किया था कि स्वीकृत टेंडर में व्यावसायिक कर की कटौती का कोई प्रावधान नहीं था। उन्होंने यह भी माना कि राइस मिल के बिलों से काटी गई व्यावसायिक कर की राशि संबंधित वाणिज्यिक कर विभाग में जमा नहीं की गई थी।

इन तथ्यों के आधार पर हाईकोर्ट ने एफसीआई की ओर से की गई कटौती को गलत माना और राइस मिल के पक्ष में पारित मूल डिक्री बरकरार रखी।

12 से घटाकर 6 प्रतिशत किया ब्याज

जस्टिस सुषमा सावंत ने कहा कि सिविल प्रक्रिया संहिता की धारा 34 के तहत सामान्यतः 6 प्रतिशत वार्षिक ब्याज उचित है। राइस मिल की ओर से ऐसा कोई साक्ष्य प्रस्तुत नहीं किया गया, जिससे अधिक ब्याज दिए जाने का आधार बनता हो।

हाईकोर्ट ने 2,46,960 रुपये की मूल डिक्री बरकरार रखते हुए निर्देश दिया कि इस राशि पर वाद दायर करने की तारीख 27 मार्च 2002 से वास्तविक भुगतान तक 6 प्रतिशत वार्षिक ब्याज दिया जाए। इस तरह एफसीआई की अपील ब्याज की दर के मामले में आंशिक रूप से स्वीकार की गई।


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