November 7, 2026

जौं अनीति कछु भाषौं भाई। तौ मोहि बरजहु भय बिसराई॥’ में भगवान श्रीराम अयोध्यावासियों से कहते हैं कि यदि उनके मुख से कभी कोई अनुचित या नीतिविरुद्ध बात निकले तो वे बिना किसी भय के उन्हें रोक दें। जनता के सामने स्वयं को कसौटी पर रखने का यह साहस ही आत्मविश्वासी नेतृत्व की पहचान है।

लोकतंत्र में किसी सरकार की सफलता का वास्तविक पैमाना घोषणाओं, बैठकों और योजनाओं की संख्या नहीं, बल्कि आम नागरिक के जीवन में आने वाला सकारात्मक बदलाव होता है। जनता की शिकायत सुनी जाए, उसे समय पर न्याय मिले, सरकारी दफ्तरों के अनावश्यक चक्कर न लगाने पड़ें और अधिकारी समस्याओं के समाधान के लिए खुद आगे आएं—यही सुशासन की असली पहचान है।

मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव का मुख्यमंत्री जन विश्वास अभियान के तहत बिना पूर्व सूचना किसी भी जिले में पहुंचकर प्रशासनिक कामकाज का जायजा लेने का निर्णय इसी कसौटी पर महत्वपूर्ण है। यह पहल सरकारी मशीनरी को स्पष्ट संदेश देती है कि जनता की समस्याओं का समाधान केवल फाइलों और कागजों में नहीं, बल्कि धरातल पर दिखाई देना चाहिए।

जनता का सुख ही आदर्श शासन का आधार

रामचरितमानस की एक अन्य चौपाई—‘जासु राज प्रिय प्रजा दुखारी। सो नृपु अवसि नरक अधिकारी॥’—का भाव है कि जिस शासक के राज्य में प्रजा दुखी रहती है, उसका शासन आदर्श नहीं माना जा सकता। जनकल्याण ही शासन की नैतिक कसौटी है।

मुख्यमंत्री ने कलेक्टर, कमिश्नर, पुलिस अधीक्षक और आईजी स्तर के अधिकारियों की समीक्षा बैठक में स्पष्ट किया है कि जन विश्वास अभियान सरकार की प्राथमिकता है। अधिकारियों को फील्ड में रहकर अधिकतम समस्याओं का मौके पर ही निराकरण करना होगा।

मुख्यमंत्री का यह रुख सराहनीय है। जब शीर्ष नेतृत्व खुद जवाबदेही तय करने की पहल करता है, तब प्रशासन के निचले स्तर तक कार्यसंस्कृति में सुधार की संभावना बढ़ती है। आकस्मिक निरीक्षण अधिकारियों को सक्रिय रखने का प्रभावी माध्यम हो सकते हैं। हालांकि अभियान का उद्देश्य केवल कमियां पकड़ना नहीं, बल्कि व्यवस्था को स्थायी रूप से बेहतर बनाना होना चाहिए।

लंबित शिकायतें सरकार के सामने बड़ी चुनौती

मुख्यमंत्री जन विश्वास अभियान की प्रासंगिकता इसलिए भी बढ़ जाती है क्योंकि सीएम हेल्पलाइन में राजस्व, महिला एवं बाल विकास, खाद्य एवं नागरिक आपूर्ति, लोक स्वास्थ्य एवं चिकित्सा तथा लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी जैसे विभागों की बड़ी संख्या में शिकायतें लंबित बताई गई हैं। ये सभी विभाग सीधे आम नागरिक के रोजमर्रा के जीवन से जुड़े हैं।

जमीन का विवाद हो, राशन की समस्या, महिलाओं और बच्चों के अधिकारों का सवाल या स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी—इन मामलों में देरी केवल प्रशासनिक विलंब नहीं होती, बल्कि किसी परिवार की परेशानी को और बढ़ा देती है।

मुख्य सचिव अशोक वर्णवाल की ओर से कुछ जिलों में अभियान के प्रति अपेक्षित गंभीरता नहीं दिखने पर नाराजगी जताना भी बताता है कि सरकारी निर्देशों और जमीनी क्रियान्वयन के बीच अभी दूरी बनी हुई है। इस अंतर को खत्म करना मोहन सरकार के सामने बड़ी चुनौती है।

शिकायत को केवल निस्तारित दिखा देना अब पर्याप्त नहीं होना चाहिए। समाधान की गुणवत्ता, शिकायतकर्ता की संतुष्टि और समस्या दोबारा सामने न आने की स्थिति की भी जांच जरूरी है। ऐसा नहीं हुआ तो आंकड़ों में सुधार के बावजूद जनता का विश्वास कमजोर रह सकता है।

नि:शुल्क रजिस्ट्री योजना में लक्ष्य और उपलब्धि के बीच बड़ा अंतर

स्वामित्व अधिकार अभिलेख निष्पादन एवं पंजीयन-2026 योजना के तहत पात्र हितग्राहियों को नि:शुल्क रजिस्ट्री उपलब्ध कराने का प्रयास ग्रामीण और शहरी नागरिकों के संपत्ति संबंधी अधिकारों को मजबूत करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है।

21 अक्टूबर 2026 तक 49,48,980 प्लॉट की नि:शुल्क रजिस्ट्री के निर्धारित लक्ष्य के मुकाबले 1,60,230 रजिस्ट्रियां पूरी होने की जानकारी दी गई थी। यानी लक्ष्य का लगभग 3.24 प्रतिशत ही हासिल हो पाया था।

यह आंकड़ा योजना के उद्देश्य के साथ-साथ क्रियान्वयन की चुनौतियों की ओर भी ध्यान खींचता है। इतनी कम प्रगति को देखते हुए प्रक्रिया की गति, दस्तावेजों की उपलब्धता, पात्र हितग्राहियों की पहचान और स्थानीय स्तर पर आने वाली बाधाओं की समीक्षा जरूरी है।

रीवा, शहडोल और धार में शून्य प्रगति वाले क्षेत्रों पर मुख्यमंत्री की सख्ती और बेहतर प्रदर्शन करने वाले अधिकारियों तथा पटवारियों की प्रशंसा जवाबदेही और प्रोत्साहन के संतुलित दृष्टिकोण को दर्शाती है। अब इस सख्ती का परिणाम रजिस्ट्रियों की बढ़ती संख्या और वास्तविक हितग्राहियों तक लाभ पहुंचने के रूप में दिखना चाहिए।

कम बारिश वाले जिलों के लिए पहले से बने कार्ययोजना

मध्य प्रदेश में सामान्य 949 मिलीमीटर वर्षा के मुकाबले इस वर्ष 908.4 मिलीमीटर वास्तविक वर्षा दर्ज होने और 12 जिलों में सामान्य से 19 प्रतिशत से अधिक कम बारिश की जानकारी गंभीरता से लेने योग्य है।

धार, आलीराजपुर, झाबुआ, नर्मदापुरम, रतलाम, हरदा, बैतूल, उज्जैन, इंदौर, पांढुर्णा, शाजापुर और छिंदवाड़ा जैसे जिलों में खेती-किसानी, पेयजल और सिंचाई की जरूरतों को ध्यान में रखते हुए विशेष कार्ययोजना बनाने के मुख्यमंत्री के निर्देश समयानुकूल हैं।

यह भी समझना जरूरी है कि औसत वर्षा का आंकड़ा किसी जिले के हर गांव की वास्तविक स्थिति नहीं बताता। कहीं जलस्रोत पर्याप्त हो सकते हैं, तो कहीं कम बारिश का असर फसलों और पेयजल पर गंभीर हो सकता है। इसलिए पंचायत स्तर पर जल उपलब्धता, फसलों की स्थिति, सिंचाई के साधनों और किसानों की जरूरतों का आकलन कर राहत तथा वैकल्पिक व्यवस्थाएं सुनिश्चित करनी होंगी।

संकट आने से पहले बचाव के उपाय करना, बाद में पैदा हुई परेशानी से निपटने की तुलना में अधिक प्रभावी और किफायती होता है।

स्वास्थ्य और सड़क सुविधाओं में गुणवत्ता पर भी ध्यान जरूरी

मौसम में बदलाव से होने वाली बीमारियों की पहचान और उपचार के लिए जिला अस्पतालों तथा शासकीय चिकित्सा महाविद्यालयों में चेस्ट क्लीनिक शुरू करने की पहल स्वास्थ्य सेवाओं को अधिक तत्पर बनाने की दिशा में सकारात्मक कदम है। लेकिन केवल क्लीनिक खोल देना पर्याप्त नहीं होगा। वहां पर्याप्त चिकित्सक, जांच सुविधाएं, जरूरी दवाएं और समय पर उपचार भी उपलब्ध होना चाहिए।

इसी तरह दीपावली से पहले क्षतिग्रस्त सड़कों की मरम्मत, अधूरे नगरीय निर्माण कार्यों को पूरा करने और दुर्घटना संभावित स्थानों पर सुरक्षा उपाय करने के निर्देश सीधे नागरिकों की सुविधा और सुरक्षा से जुड़े हैं।

इन कार्यों की सफलता केवल तय समयसीमा में पूरा होने से नहीं, बल्कि उनकी गुणवत्ता से भी तय होगी। जल्दबाजी में किए गए निर्माण यदि कुछ ही समय बाद फिर खराब हो जाते हैं तो सरकारी खर्च बढ़ने के साथ जनता का भरोसा भी प्रभावित होता है।

पशुपालन और कृषि को बढ़ावा देने की पहल

गोवर्धन पूजा पर 208 वृंदावन ग्रामों के पशुपालकों को गोपाल कृष्ण ग्राम पुरस्कार देने और अगले वर्ष इस योजना को सभी विकासखंडों तक विस्तारित करने का प्रस्ताव ग्रामीण अर्थव्यवस्था, पशुपालन और पारंपरिक जीवनमूल्यों को प्रोत्साहित करने की दृष्टि से सकारात्मक है।

मध्य प्रदेश स्थापना दिवस पर कृषि केंद्रित प्रदर्शनी का आयोजन भी राज्य की कृषि क्षमता और ग्रामीण विकास की संभावनाओं को सामने लाने का अच्छा अवसर बन सकता है।

सुशासन के लिए आकस्मिक निरीक्षण से आगे बढ़ना होगा

मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव प्रशासन को जनता के प्रति जवाबदेह बनाने का प्रयास कर रहे हैं। बिना पूर्व सूचना किसी जिले में पहुंचने की घोषणा अधिकारियों को याद दिलाती है कि शासन की प्राथमिकता केवल फाइलों का निपटारा नहीं, बल्कि जनसेवा है।

लेकिन सुशासन की स्थायी व्यवस्था केवल मुख्यमंत्री के आकस्मिक दौरों पर निर्भर नहीं रह सकती। मुख्यमंत्री की मौजूदगी के बिना भी अधिकारी नियमित रूप से जनता से मिलें, शिकायतों का समयबद्ध समाधान करें और अपने काम का सार्वजनिक हिसाब दें, तभी इसे वास्तविक प्रशासनिक सुधार कहा जा सकेगा।

इसके लिए विभागवार लंबित शिकायतों की नियमित समीक्षा, समाधान की स्वतंत्र जांच, नागरिकों से फीडबैक और लापरवाही पर निष्पक्ष कार्रवाई जरूरी है। साथ ही अधिकारियों को पर्याप्त संसाधन, स्पष्ट जिम्मेदारियां और समयबद्ध निर्णय लेने का अधिकार भी दिया जाना चाहिए।

तटस्थ दृष्टि से देखें तो मुख्यमंत्री के निर्देश और प्राथमिकताएं सकारात्मक हैं, लेकिन घोषणाओं और वास्तविक परिणामों के बीच का अंतर ही इस अभियान की असली परीक्षा होगा। किसी जिले में निरीक्षण के दिन व्यवस्था चुस्त दिखाई देना पर्याप्त नहीं है। जरूरी यह है कि व्यवस्था अगले दिन, अगले महीने और पूरे वर्ष उतनी ही संवेदनशील बनी रहे।

लोकतंत्र में जनता केवल सरकारी योजनाओं की लाभार्थी नहीं, बल्कि शासन की सबसे महत्वपूर्ण हितधारक है। मुख्यमंत्री जन विश्वास अभियान यदि शिकायतों के नियमित, पारदर्शी और जवाबदेह निपटारे की व्यवस्था में बदलता है तो यह मध्य प्रदेश में प्रशासनिक संस्कृति के परिवर्तन का आधार बन सकता है।

धरातल की सच्चाई यही है कि जनविश्वास भाषणों से नहीं, अनुभव से अर्जित होता है। जब किसान को समय पर सहायता मिले, महिला को सरकारी योजना का लाभ बिना बाधा प्राप्त हो, मरीज को सुलभ उपचार मिले और नागरिक की शिकायत का समाधान उसकी संतुष्टि के साथ हो, तभी सरकार की संवेदनशीलता साबित होती है।

मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के सामने अवसर भी बड़ा है और चुनौती भी। आकस्मिक निरीक्षण इस दिशा में प्रभावी शुरुआत हो सकते हैं। अब देखना यह होगा कि क्या यह पहल सरकारी मशीनरी को वास्तव में जवाबदेह बना पाएगी और आम नागरिक को शासन पर अपना विश्वास मजबूत होता महसूस होगा।

क्योंकि जनता का विश्वास ही सरकार की सबसे बड़ी धरोहर है और उसकी रक्षा करना ही सुशासन की सबसे बड़ी जिम्मेदारी और कसौटी है।

‘प्रजासुखे सुखं राज्ञः प्रजानां च हिते हितम्।
नात्मप्रियं हितं राज्ञः प्रजानां तु प्रियं हितम्॥’

आचार्य चाणक्य द्वारा रचित कौटिल्य अर्थशास्त्र के इस श्लोक का भाव है कि राजा का सुख प्रजा के सुख में और उसका हित प्रजा के हित में निहित है। इसलिए शासक को अपने निजी सुख के बजाय जनता के कल्याण को प्राथमिकता देनी चाहिए।

About The Author

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *