जगदलपुर। 75 दिनों तक मनाए जाने वाले विश्व प्रसिद्ध बस्तर दशहरा पर्व में रथ परिक्रमा की अंतिम बाहर रैनी रस्म पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ संपन्न हुई। इस अनूठी परंपरा में बस्तर राजपरिवार के सदस्य कमलचंद भंजदेव चोरी हुए रथ को तलाशते हुए कुम्हड़ाकोट के जंगल पहुंचे। यहां उन्होंने नाराज ग्रामीणों को मनाया और उनके साथ जमीन पर बैठकर नवाखाई यानी नई फसल के चावल से बनी खीर खाई। इसके बाद पूरे शाही अंदाज में रथ को वापस राजमहल लाया गया।

इस ऐतिहासिक रस्म को देखने के लिए हजारों की संख्या में आदिवासी, बस्तरवासी और दूसरे राज्यों से आए पर्यटक मौजूद रहे।
विजयादशमी की रात ग्रामीणों ने चुराया था रथ
बाहर रैनी की परंपरा के अनुसार, विजयादशमी की आधी रात को सैकड़ों माड़िया और गोंड जनजाति के ग्रामीण रथ को राजमहल परिसर से चुराकर करीब चार किलोमीटर दूर कुम्हड़ाकोट के जंगल में ले जाते हैं। रथ को जंगल में छिपाने के बाद सुबह इसकी सूचना बस्तर महाराजा को दी जाती है।
इसके बाद माड़िया जनजाति के ग्रामीण राजपरिवार के सदस्य को अपने बीच आमंत्रित करते हैं और नवाखाई में शामिल होने का न्योता देते हैं। इस दौरान ग्रामीण उनसे जमीन पर बैठकर नए चावल से बनी खीर खाने का आग्रह करते हैं।
ग्रामीणों के साथ जमीन पर बैठकर खाई नवाखाई की खीर
परंपरा का निर्वहन करते हुए कमलचंद भंजदेव ग्रामीणों के बीच पहुंचे और उनके साथ जमीन पर बैठकर नवाखाई की खीर खाई। इसके बाद ग्रामीणों को मनाकर रथ को वापस राजमहल ले जाया गया। रथ की वापसी भी पारंपरिक और शाही अंदाज में हुई।
आज भी पूरी श्रद्धा से निभाई जा रही परंपरा
बस्तर राजपरिवार के सदस्य कमलचंद भंजदेव ने बताया कि बाहर रैनी की यह परंपरा आज भी पूरी श्रद्धा और रीति-रिवाजों के साथ निभाई जाती है। यह रस्म बस्तर दशहरा की विशिष्ट पहचान है, जिसमें राजपरिवार और आदिवासी समाज के बीच पारंपरिक संबंधों की झलक देखने को मिलती है।
बस्तर दशहरा केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि यहां की आदिवासी संस्कृति, लोक परंपराओं और सामुदायिक एकता का अनूठा प्रतीक है। बाहर रैनी की रस्म इसी विरासत को पीढ़ी-दर-पीढ़ी जीवित रखे हुए है।