बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने फेसबुक पर दोस्ती के बाद मंदिर में हुई शादी को सात फेरे नहीं होने के आधार पर शून्य घोषित कराने की मांग वाली याचिका खारिज कर दी है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 11 के तहत विवाह को शून्य घोषित करने के आधार सीमित हैं। केवल विवाह की रस्मों को लेकर विवाद होने से इस धारा के तहत विवाह को अमान्य घोषित नहीं किया जा सकता।

जस्टिस पार्थ प्रतीम साहू और जस्टिस सुषमा सावंत की डिवीजन बेंच ने फैमिली कोर्ट के फैसले को निरस्त कर दिया। हालांकि, कोर्ट ने पति की मूल याचिका भी खारिज कर दी, क्योंकि वह धारा 11 के तहत सुनवाई योग्य नहीं थी।
फेसबुक पर दोस्ती के बाद मंदिर में हुई थी शादी
मामला जांजगीर-चांपा जिले के रहौद में रहने वाले युवक और युवती से जुड़ा है। दोनों की मुलाकात फेसबुक के जरिए हुई थी, जिसके बाद उनके बीच प्रेम संबंध बने और शादी की बात आगे बढ़ी। युवक के अनुसार, युवती के परिवार से मुलाकात के दौरान उसने पहले अपने परिवार की सहमति लेने की बात कही थी।
युवक का आरोप था कि 3 फरवरी 2022 को उसे युवती के घर बुलाया गया और शादी के लिए दबाव बनाया गया। उसने दावा किया कि आपराधिक मामले में फंसाने की धमकी देकर विवाह संबंधी दस्तावेजों पर हस्ताक्षर कराए गए। इसके बाद चिरमिरी स्थित शिव मंदिर में जल्दबाजी में शादी कराई गई।
युवक ने सात फेरे नहीं होने का दिया हवाला
युवक का कहना था कि विवाह के दौरान हिंदू रीति-रिवाज के अनुसार अग्नि के सामने सप्तपदी यानी सात कदम लेने की रस्म नहीं हुई थी। इसी आधार पर उसने विवाह को शून्य घोषित करने की मांग करते हुए हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 11 के तहत फैमिली कोर्ट में आवेदन दिया था।
वहीं, युवती ने युवक के आरोपों का विरोध किया। उसका कहना था कि विवाह हिंदू रीति-रिवाजों के अनुसार हुआ था। युवती के मुताबिक, शादी के बाद युवक ने उसे पत्नी के रूप में स्वीकार किया और दोनों करीब डेढ़ महीने तक साथ रहे। उसने यह भी आरोप लगाया कि युवक ने भरण-पोषण की कार्यवाही से बचने के लिए विवाह को अमान्य घोषित कराने की कोशिश की।
हाईकोर्ट ने फैमिली कोर्ट का फैसला क्यों पलटा?
मामले की सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने पाया कि फैमिली कोर्ट ने आवेदन की कानूनी स्वीकार्यता पर विचार करने के बजाय विवाह की रस्मों और उसकी वैधता के सवाल पर फैसला दिया था।
हाईकोर्ट के अनुसार, हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 11 के तहत सबसे पहले यह देखना जरूरी था कि विवाह में अधिनियम की धारा 5 की संबंधित शर्तों का उल्लंघन हुआ है या नहीं। इस कानूनी पहलू पर उचित विचार नहीं किए जाने के कारण फैमिली कोर्ट का फैसला निरस्त किया गया।
हालांकि, फैमिली कोर्ट का फैसला रद्द होने का अर्थ यह नहीं था कि युवक को विवाह शून्य घोषित कराने की राहत मिल गई। हाईकोर्ट ने उसकी मूल याचिका को ही धारा 11 के तहत सुनवाई योग्य नहीं माना और उसे खारिज कर दिया।
क्या है हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 11?
हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 11 उन विवाहों को शून्य घोषित करने से संबंधित है, जो अधिनियम में निर्धारित कुछ विशिष्ट कानूनी शर्तों का उल्लंघन करते हैं। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि इस प्रावधान के तहत विवाह को शून्य घोषित करने की मांग करते समय यह देखना आवश्यक है कि मामला कानून में निर्धारित आधारों के दायरे में आता है या नहीं।
इस मामले में हाईकोर्ट ने फैमिली कोर्ट के फैसले को कानूनी त्रुटि के कारण निरस्त किया, लेकिन युवक को विवाह शून्य घोषित कराने की राहत नहीं दी।