September 15, 2026

बिलासपुर। सेवानिवृत्ति के बाद ग्रेच्युटी से राशि काटना छत्तीसगढ़ वन विभाग को भारी पड़ गया। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने महासमुंद के सेवानिवृत्त वनरक्षक मकरध्वज यादव को राहत देते हुए विभाग की कार्रवाई निरस्त कर दी है। कोर्ट ने ग्रेच्युटी से काटी गई 1,63,464 रुपए की राशि वापस करने का निर्देश दिया है।

वेतन निर्धारण में गलती बताकर काटी गई थी राशि

मकरध्वज यादव महासमुंद जिले के सांकरा के रहने वाले हैं। वे 31 मार्च 2020 को वनरक्षक के पद से सेवानिवृत्त हुए थे। सेवानिवृत्ति के बाद महासमुंद के संभागीय वन अधिकारी ने वेतन निर्धारण में गलती का हवाला देते हुए उनकी ग्रेच्युटी से 1,63,464 रुपए की कटौती कर ली थी।

राशि वापस पाने के लिए यादव ने विभागीय अधिकारियों को कई आवेदन दिए, लेकिन उन्हें राहत नहीं मिली। इसके बाद उन्होंने स्थानीय अधिवक्ता बजरंग अग्रवाल के माध्यम से हाईकोर्ट में रिट याचिका दायर कर विभागीय आदेश को चुनौती दी।

ग्रेच्युटी कटौती को लेकर कोर्ट में क्या दलील दी गई?

याचिकाकर्ता की ओर से दलील दी गई कि पेमेंट ऑफ ग्रेच्युटी एक्ट, 1972 की धारा 4(6)(a) और 4(6)(b) में ग्रेच्युटी की जब्ती या कटौती के लिए विशेष परिस्थितियां निर्धारित हैं।

याचिकाकर्ता का कहना था कि इन वैधानिक परिस्थितियों के बिना किसी सेवानिवृत्त कर्मचारी की ग्रेच्युटी से राशि काटना कानून के अनुरूप नहीं है।

वहीं, राज्य सरकार की ओर से याचिका का विरोध करते हुए विभाग द्वारा की गई कटौती को उचित बताया गया।

हाईकोर्ट ने रिकॉर्ड की जांच के बाद क्या कहा?

मामले की सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने दोनों पक्षों की दलीलों और संबंधित रिकॉर्ड का परीक्षण किया। कोर्ट ने पाया कि मकरध्वज यादव की सेवाएं ऐसी किसी परिस्थिति के आधार पर समाप्त नहीं की गई थीं, जो ग्रेच्युटी की जब्ती से संबंधित धारा 4(6)(a) या 4(6)(b) के दायरे में आती हो।

ऐसे में ग्रेच्युटी से राशि की वसूली के लिए आवश्यक वैधानिक आधार मौजूद नहीं था। कोर्ट ने विभाग की कार्रवाई को कानून के अनुरूप नहीं माना।

24 अप्रैल 2020 का विभागीय आदेश निरस्त

हाईकोर्ट ने 24 अप्रैल 2020 को जारी विभागीय आदेश को निरस्त कर दिया। साथ ही वन विभाग को निर्देश दिया कि मकरध्वज यादव की ग्रेच्युटी से काटी गई 1,63,464 रुपए की राशि वापस की जाए।

रिटायर कर्मचारियों के लिए क्यों अहम है फैसला?

यह फैसला सेवानिवृत्त कर्मचारियों के लिए महत्वपूर्ण माना जा सकता है। कोर्ट के आदेश से यह स्पष्ट होता है कि ग्रेच्युटी से कटौती या उसकी जब्ती मनमाने तरीके से नहीं की जा सकती। इसके लिए संबंधित कानून में निर्धारित परिस्थितियों और वैधानिक प्रक्रिया का पालन आवश्यक है।

इस मामले में कोर्ट ने विभागीय वसूली को इसलिए स्वीकार नहीं किया क्योंकि रिकॉर्ड के मुताबिक ग्रेच्युटी की कटौती के लिए कानून में निर्धारित परिस्थितियां मौजूद नहीं थीं।

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