जगदलपुर। बस्तर दशहरा केवल एक पर्व नहीं, बल्कि सदियों पुरानी आस्था, अनूठी परंपराओं और समृद्ध सांस्कृतिक विरासत का प्रतीक है। शनिवार रात काछन गादी की रस्म के साथ विश्व प्रसिद्ध बस्तर दशहरा की शुरुआत हुई। इस परंपरा में पनका समाज की नाबालिग कुंवारी कन्या पीहू दास बेल के कांटों से बने झूले पर लेटकर दशहरा पर्व मनाने की अनुमति देती हैं। मान्यता है कि इस दौरान काछनदेवी कन्या के शरीर में प्रवेश कर राजपरिवार को पर्व शुरू करने की अनुमति देती हैं। करीब 600 साल पुरानी यह परंपरा आज भी पूरी आस्था और विश्वास के साथ निभाई जा रही है।

बेल के कांटों के झूले पर लेटकर निभाई गई परंपरा
बस्तर दशहरा निर्विघ्न संपन्न होने और मां काछनदेवी का आशीर्वाद बने रहने की कामना के साथ शनिवार रात पथरागुड़ा स्थित काछन गुड़ी में विशेष पूजा-अर्चना की गई। इस दौरान पनका समाज के विशेष परिवार की कुंवारी कन्या पीहू दास बेल के कांटों से बने झूले पर लेटीं और राजपरिवार को दशहरा पर्व शुरू करने की अनुमति दी।
पीहू दास पिछले पांच वर्षों से इस कठिन और अनूठी परंपरा का निर्वहन कर रही हैं। काछन गादी की रस्म बस्तर दशहरा की प्रमुख धार्मिक परंपराओं में से एक मानी जाती है।
काछनदेवी की अनुमति के बाद शुरू होता है दशहरा
स्थानीय मान्यता के अनुसार, मां काछनदेवी की अनुमति के बिना बस्तर दशहरा की शुरुआत नहीं होती। हर साल पितृमोक्ष अमावस्या के अवसर पर यह रस्म निभाई जाती है। इसे देखने के लिए राजपरिवार के सदस्यों, जनप्रतिनिधियों और बड़ी संख्या में श्रद्धालु काछन गुड़ी पहुंचते हैं।
मान्यता है कि काछनदेवी पीहू दास के शरीर में प्रवेश कर पर्व आयोजन के लिए अपनी स्वीकृति देती हैं। इसी आस्था के साथ राजपरिवार और श्रद्धालु दशहरा पर्व के निर्विघ्न आयोजन की कामना करते हैं।
600 साल पुरानी परंपरा आज भी कायम
आधुनिक दौर में भी बस्तर की यह प्राचीन परंपरा यहां की सांस्कृतिक पहचान और धार्मिक आस्था को जीवंत बनाए हुए है। काछन गादी की रस्म के साथ बस्तर दशहरा के धार्मिक आयोजनों का सिलसिला शुरू हो गया है। यह परंपरा पीढ़ियों से चली आ रही मान्यताओं और बस्तर की विशिष्ट सांस्कृतिक विरासत को दर्शाती है।