राजनांदगांव। एडवर्ड पार्क की विवादित जमीन पर निर्माण को लेकर प्रशासन के आदेशों के बावजूद काम आगे बढ़ने की शिकायत सामने आई है। जिला प्रशासन ने जांच पूरी होने तक यथास्थिति बनाए रखने के निर्देश दिए, नगर पालिका ने मौके पर नोटिस चस्पा किया, निगरानी के लिए पांच सदस्यीय टीम बनाई और बाद में दोबारा नोटिस भी जारी किया। इसके बावजूद निर्माण जारी रहने का आरोप है।

ताजा घटनाक्रम में राजस्व और नगर पालिका की टीम मौके पर पहुंची, निर्माण कार्य बंद कराया और कुछ निर्माण सामग्री जब्त की। हालांकि शिकायतकर्ताओं का आरोप है कि टीम के लौटने के बाद फिर से काम शुरू हो गया। नगर पालिका ने अब चेतावनी दी है कि यथास्थिति के आदेश के बावजूद निर्माण जारी मिला तो संबंधित लोगों के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराई जाएगी।
मामला सिर्फ विवादित जमीन पर निर्माण तक सीमित नहीं है। इससे यह सवाल भी उठ रहा है कि जब प्रशासन ने यथास्थिति बनाए रखने के लिए स्पष्ट आदेश जारी किए थे और निगरानी टीम भी गठित की गई थी, तो निर्माण आगे कैसे बढ़ा?
सिविल कोर्ट के सामने की जमीन को लेकर विवाद
मामला राजनांदगांव-कवर्धा रोड पर सिविल कोर्ट के सामने स्थित एडवर्ड पार्क की जमीन से जुड़ा है। विवादित जमीन में खसरा नंबर 167, 169 और 170 तथा नजूल भूखंड क्रमांक 114 और 115 शामिल बताए गए हैं।
जमीन के स्वरूप और कथित अवैध प्लाटिंग को लेकर शिकायतों के बाद जिला प्रशासन ने 8 जून 2026 को अपर कलेक्टर की अध्यक्षता में सात सदस्यीय उच्चस्तरीय जांच समिति गठित की थी। जांच पूरी होने तक मौके पर यथास्थिति बनाए रखने के निर्देश दिए गए थे।
12 जून को जारी हुआ पहला नोटिस
जांच समिति के गठन के बाद नगर पालिका ने 12 जून को निर्माणाधीन भवन को लेकर नोटिस जारी किया। नोटिस मौके पर चस्पा कर निर्माण की स्थिति में बदलाव नहीं करने के निर्देश दिए गए।
यानी प्रशासनिक स्तर पर यह स्पष्ट किया जा चुका था कि जमीन से जुड़ा मामला जांच के अधीन है और जांच पूरी होने तक निर्माण की मौजूदा स्थिति में कोई बदलाव नहीं किया जाना है।
इसके बावजूद निर्माण आगे बढ़ने की शिकायत सामने आती रही।
यथास्थिति की निगरानी के लिए बनाई गई पांच सदस्यीय टीम
निर्माण पर नजर रखने के लिए नगर पालिका ने 13 अगस्त को पांच सदस्यीय टीम गठित की। इसमें आरआई मनोज शुक्ला, एआरआई राजेश तिवारी, एआरआई पीयूष चंद्र यदु, पंप चालक टोडर सिंह और प्लेसमेंट कर्मचारी अंकुर सिंह को शामिल किया गया।
टीम को जांच समिति की रिपोर्ट आने तक मौके पर किसी नए निर्माण को रोकने और यथास्थिति बनाए रखने की जिम्मेदारी दी गई।
इसके बाद 18 अगस्त को नगर पालिका ने एक और नोटिस जारी कर निर्माण को मौजूदा स्थिति में बनाए रखने के निर्देश दिए।
इस तरह मामले में आदेश, नोटिस और निगरानी व्यवस्था—तीनों मौजूद थे। इसके बावजूद निर्माण आगे बढ़ने की शिकायत ने निगरानी व्यवस्था की प्रभावशीलता पर सवाल खड़े कर दिए हैं।
कार्रवाई हुई, लेकिन फिर निर्माण शुरू होने का आरोप
ताजा घटनाक्रम में राजस्व और नगर पालिका की संयुक्त टीम मौके पर पहुंची। टीम ने निर्माण कार्य बंद कराया और कुछ निर्माण सामग्री जब्त की।
हालांकि शिकायतकर्ताओं का आरोप है कि अधिकारियों के मौके से लौटने के बाद निर्माण दोबारा शुरू हो गया।
यदि यह आरोप सही पाया जाता है तो यह सवाल उठेगा कि मौके पर की गई कार्रवाई को प्रभावी तरीके से लागू क्यों नहीं कराया जा सका। शिकायत के मुताबिक, जून में जहां निर्माण शुरुआती स्थिति में था और कॉलम खड़े थे, वहीं अब डीपीसी लेवल के बाद छज्जे की ढलाई के लिए कॉलम खड़े किए जाने की स्थिति सामने आई है।
इससे यथास्थिति बनाए रखने के आदेश के पालन को लेकर सवाल उठ रहे हैं।
एनओसी की शर्तों पर भी उठ रहे सवाल
मामले में नगर पालिका की ओर से जारी एनओसी की शर्तें भी चर्चा में हैं। बताया गया है कि एनओसी की कंडिका 8 में प्रमाणपत्र की वैधता एक साल रहने और निर्धारित अवधि में निर्माण नहीं होने पर नवीनीकरण के बाद काम शुरू करने की शर्त है।
वहीं, कंडिका 15 में अवैध प्लाटिंग का हिस्सा पाए जाने पर एनओसी तत्काल प्रभाव से निरस्त किए जाने का प्रावधान बताया गया है।
बताया जा रहा है कि एडवर्ड पार्क में कुछ निर्माणों के लिए वर्ष 2023-24 में एनओसी ली गई थी। ऐसे में यह स्पष्ट किया जाना बाकी है कि संबंधित एनओसी की वैधता समाप्त होने के बाद उनका नियमानुसार नवीनीकरण हुआ या नहीं।
अगर नवीनीकरण नहीं हुआ था तो निर्माण आगे कैसे बढ़ा और यदि नवीनीकरण हुआ था तो उसकी शर्तों का पालन किस स्तर पर जांचा गया—ये सवाल अब नगर पालिका के सामने हैं।
खसरा नंबर को लेकर दस्तावेजों में अंतर
मामले में दस्तावेजों के स्तर पर भी एक सवाल सामने आया है। 13 अगस्त के नगर पालिका आदेश में विवादित खसरा नंबर 167 की जगह 187 लिखा हुआ दिखाई देता है, जबकि 12 जून और 18 अगस्त के दस्तावेजों में खसरा नंबर 167 दर्ज है।
यह महज टाइपिंग की गलती है या रिकॉर्ड से जुड़ा कोई अलग संदर्भ, इसे नगर पालिका और राजस्व विभाग की ओर से स्पष्ट किया जाना जरूरी है। जमीन विवाद के मामलों में खसरा नंबर महत्वपूर्ण रिकॉर्ड होता है, इसलिए दस्तावेजों में इस तरह के अंतर की स्थिति स्पष्ट किया जाना चाहिए।
ठेले-गुमटियों पर कार्रवाई से तुलना क्यों?
एडवर्ड पार्क मामले में नगर पालिका की कार्रवाई को लेकर एक और सवाल उठ रहा है। कुछ समय पहले पार्क के सामने लगे छोटे-बड़े ठेले और गुमटियों को आवाजाही में परेशानी का हवाला देते हुए जेसीबी से हटाया गया था।
अब स्थानीय स्तर पर यह सवाल उठाया जा रहा है कि छोटे दुकानदारों के खिलाफ तत्काल कार्रवाई हो सकती है तो जांचाधीन जमीन पर निर्माण रोकने के लिए जारी आदेशों को भी उसी गंभीरता से लागू क्यों नहीं कराया जा रहा?
हालांकि यह तुलना अपने आप में किसी पक्ष की कानूनी स्थिति तय नहीं करती, लेकिन इससे प्रशासनिक कार्रवाई में समानता और आदेशों के प्रभावी क्रियान्वयन को लेकर सवाल जरूर उठ रहे हैं।
CMO ने कहा- निर्माण जारी मिला तो होगी FIR
नगर पालिका सीएमओ पुनीतराम वर्मा के मुताबिक, यथास्थिति बनाए रखने के लिए आरआई और एआरआई समेत पांच लोगों की टीम गठित की गई है। लगातार नोटिस जारी किए जाने के बावजूद निर्माण कार्य चलता मिला, जिसके बाद मौके पर सामान जब्त किया गया।
सीएमओ ने कहा कि यदि इसके बाद भी निर्माण जारी मिला तो संबंधित लोगों के खिलाफ थाने में नामजद एफआईआर दर्ज कराई जाएगी।
अब निगाह इस बात पर है कि प्रशासन की अगली कार्रवाई केवल नोटिस और जब्ती तक सीमित रहती है या वास्तव में निर्माण पर प्रभावी रोक लगाई जाती है।
जांच पूरी होने तक यथास्थिति बनाए रखना बड़ी चुनौती
एडवर्ड पार्क की जमीन का वास्तविक स्वामित्व, सरकारी रिकॉर्ड में जमीन की स्थिति, कथित प्लाटिंग और पुराने लेन-देन की वैधता जैसे मुद्दों का फैसला जांच समिति और सक्षम प्राधिकारी की रिपोर्ट के आधार पर होना है।
लेकिन जांच पूरी होने तक यथास्थिति बनाए रखना प्रशासन की तत्काल जिम्मेदारी है। इसी वजह से अब इस पूरे मामले में जमीन के विवाद से ज्यादा प्रशासनिक आदेशों के पालन पर भी नजर है।
नोटिस जारी होने, निगरानी टीम गठित होने और मौके पर कार्रवाई के बावजूद यदि निर्माण आगे बढ़ता है, तो सवाल यही रहेगा कि सरकारी आदेश जमीन पर कितनी मजबूती से लागू हो रहे हैं।