सुकमा हत्याकांड में अभियुक्त की गैरमौजूदगी में गवाहों के बयान दर्ज करने को निष्पक्ष सुनवाई के अधिकार का गंभीर उल्लंघन माना; करीब 9 साल से जेल में बंद मुन्ना को तत्काल जमानत पर रिहा करने का आदेश

नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने छत्तीसगढ़ के सुकमा जिले में हत्या के एक मामले में मुन्ना मंडावी की उम्रकैद की सजा और छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट, बिलासपुर के फैसले को रद्द कर दिया है। अदालत ने कहा कि अभियुक्त की गैरमौजूदगी में गवाहों के बयान दर्ज करना निष्पक्ष सुनवाई के अधिकार का गंभीर उल्लंघन है। शीर्ष अदालत ने मामले में नए सिरे से सुनवाई करने और मुन्ना मंडावी को तत्काल जमानत पर रिहा करने का निर्देश दिया है।
सुप्रीम कोर्ट की डिवीजन बेंच ने दिया आदेश
जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा और जस्टिस नोङमीकपम कोटिश्वर सिंह की डिवीजन बेंच ने मामले की सुनवाई के बाद यह आदेश दिया। मुन्ना मंडावी करीब 9 साल से जेल में बंद है। अदालत ने निर्देश दिया कि जमानत की शर्तें ट्रायल कोर्ट तय करेगा।
बेटे की मौत के बाद हत्या का आरोप
यह मामला पुसपाल थाने में 29 दिसंबर 2017 को दर्ज अपराध से जुड़ा है। अभियोजन के अनुसार, बेटे की मौत के बाद मुन्ना मंडावी को संदेह था कि सोमारू जादू-टोना करता है और इसी वजह से उसके बेटे की मृत्यु हुई।
अभियोजन का आरोप था कि इसी संदेह में मुन्ना ने सोमारू पर कुल्हाड़ी से हमला किया, जिससे उसकी मौत हो गई।
सत्र न्यायालय ने सुनाई थी उम्रकैद की सजा
दंतेवाड़ा सत्र न्यायालय ने 1 नवंबर 2021 को मुन्ना मंडावी को भारतीय दंड संहिता की धारा 302 और छत्तीसगढ़ टोनही प्रताड़ना निवारण अधिनियम की धारा 5 के तहत दोषी ठहराते हुए उम्रकैद की सजा सुनाई थी।
इस फैसले को मुन्ना ने छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट, बिलासपुर में चुनौती दी थी। हाईकोर्ट ने सत्र न्यायालय के फैसले को बरकरार रखते हुए अपील खारिज कर दी। इसके बाद अभियुक्त ने सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर की।
अभियुक्त की गैरमौजूदगी में दर्ज हुए गवाहों के बयान
सुप्रीम कोर्ट में मुन्ना मंडावी की ओर से पेश अधिवक्ता ने दलील दी कि अभियोजन के गवाह संख्या 2 से 6 तक के बयान उस समय दर्ज किए गए, जब अभियुक्त जेल में बंद था और अदालत में मौजूद नहीं था।
वहीं, राज्य सरकार की ओर से तर्क दिया गया कि उस समय बचाव पक्ष के वकील ने इस पर कोई आपत्ति दर्ज नहीं कराई थी।
धारा 273 का हवाला देकर सुनवाई को बताया दूषित
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 273 का उल्लेख करते हुए कहा कि सामान्यतः अभियुक्त की उपस्थिति में ही बयान दर्ज किए जाने चाहिए।
अदालत ने मामले के संदर्भ में कहा कि मुन्ना एक गरीब आदिवासी है और उसे कानूनी प्रावधानों की जानकारी नहीं थी। वह कठिनाई से वकील कर पाया था। अदालत से जिला जेल की दूरी करीब तीन किलोमीटर होने के बावजूद उसे गवाही के समय पेश नहीं किया गया।
सुप्रीम कोर्ट ने इसे गंभीर प्रक्रियागत त्रुटि मानते हुए सुनवाई को दूषित घोषित किया और सजा तथा हाईकोर्ट का फैसला रद्द कर दिया। साथ ही मामले की नए सिरे से सुनवाई के निर्देश दिए।
जमानत की शर्तें ट्रायल कोर्ट करेगा तय
शीर्ष अदालत ने मुन्ना मंडावी को तत्काल जमानत पर रिहा करने का आदेश दिया है। उसकी रिहाई जमानत की उन शर्तों के अधीन होगी, जिन्हें ट्रायल कोर्ट तय करेगा। मामले की आगे की सुनवाई अब नए सिरे से की जाएगी।